शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
पङ्कदिग्धो निवर्तेत कर्मेदं नस्तथोपमम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
पङ्क्त्यः शरदि खस्थानां हंसानां चरतामिव ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
पङ्क्त्यः शरदि मत्तानां सारसानामिवाम्वरे ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
पङ्क्त्यां समुपविष्टाय़ां तावद्दूषय़ते नृप ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
पङ्गुष्वपि च देवर्षे ये चान्ये कुत्सिता नराः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
पङ्गोरिवाध्वगमनं दरिद्रस्येव कामितम् |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
पचत्यग्निरवाक्यस्तु तूष्णीं भाति दिवाकरः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पचस्वैतानि सुभगे वदराणि शुभव्रते |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पचेत्युक्त्वा स भगवाञ्जगाम वलसूदनः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
पच्यते तु पुनस्तेन भुक्त्वापथ्यमिवातुरः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्च कल्पसहस्राणि तावदेवाहरुच्यते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
पञ्च कल्पसहस्राणि द्विगुणान्यहरुच्यते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
पञ्च कोट्योऽथ पत्राणां द्वय़ोरपि च शाखय़ोः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
पञ्च चाश्वसहस्राणि पत्तीनां च शतं शताः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पञ्च चाश्वसहस्राणि रथानां शतमेव च |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पञ्च चाश्वसहस्राणि सहदेवश्च वीर्यवान् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च चैव महावीर्याः पुत्रा मे मधुसूदन |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
पञ्च चैव विशेषा वै तथा पञ्चेन्द्रिय़ाणि च ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
पञ्च चैव शतान्याहुः पञ्चविंशतिसङ्ख्यया ||
२०० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
पञ्च जित्वा विदित्वा षट्सप्त हित्वा सुखी भव ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
पञ्च ज्ञानेन सन्धाय़ मनसि स्थापय़ेद्यतिः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
पञ्च ज्ञानेन्द्रिय़ाण्युक्त्वा मनःषष्ठानि चेतसि |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
पञ्च ते पतय़ः श्रेष्ठा भविष्यन्तीति शङ्करः ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च ते पतय़ो भद्रे भविष्यन्तीति शङ्करः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
पञ्च ते भ्रातरः सर्वे धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
पञ्च त्वानुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
पञ्च दोषान्प्रभो देहे प्रवदन्ति मनीषिणः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र निःसृत्य पर्वतात् |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र पीलुवनान्यपि |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च नस्तात दीय़न्तां ग्रामा इति महाद्युते |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
पञ्च नस्तात दीय़न्तां ग्रामा वा नगराणि वा |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
पञ्च नागसहस्राणि द्विगुणा वाजिनस्तथा |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च नागसहस्राणि रथवंशाश्च सर्वशः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या व्रह्मक्षत्रस्य वै द्विज |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
पञ्च पञ्चैव लिप्सन्ति ग्रामकान्पाण्डवा नृप |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पञ्च पाञ्चालवीराणां रथान्दश च पञ्च च |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
पञ्च पूर्वादिपुरुषाः षट्च ये वसुधां गताः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
पञ्च भूतान्यतिक्रान्तः स्ववीर्याच्च मनोभवः |
८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
पञ्च भूतान्यहङ्कारादाहुः साङ्ख्यानुदर्शिनः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
पञ्च यज्ञानवाप्नोति क्रमशो येऽनुकीर्तिताः ||
९९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
पञ्च वर्षशतान्यस्या यय़ा विस्पर्धसे सह |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च वर्षशतान्येवं कचस्य चरतो व्रतम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च वर्षाणि वत्स्यामि विद्यार्थीति पुरा मय़ि ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
पञ्च वर्षाण्यहं वीरं सत्यसन्धं धनञ्जय़म् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्च वाणानसंसक्तान्स मुमोचैकवाणवत् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
पञ्च वै तेन मे दत्ता वराः शृणुत तान्मम ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
पञ्च वै पाण्डवाः शिष्टा हतमित्रा हतात्मजाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
पञ्च श्लोकसहस्राणि सङ्ख्ययाष्टौ शतानि च |
१५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
पञ्च षट्सप्त चाष्टौ च विभेद यवनाञ्शरैः ||
३७ ख