वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
प्रीतिमानभवद्वीरो मातलिः शक्रसारथिः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
४१
भगवानु उवाच
प्रीतिमानस्मि वै पार्थ तव सत्यपराक्रम |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
प्रीतिमान्भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वय़ं च ते ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतिमान्स कुरुश्रेष्ठः खानय़ामास तं निधिम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
प्रीतिमान्हि दृढं कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतिमुत्पादय़ामास कन्या यत्नैरनिन्दिता ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
प्रीतिमुत्पादय़ेय़ं च प्रतिकर्तुं च शक्नुय़ाम् ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
धृतराष्ट्र उवाच
प्रीतिर्धनञ्जय़े चास्य प्रिय़श्चापि स वासवेः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतिश्च पुरुषव्याघ्र दुर्योधनमथास्पृशत् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
प्रीतिसंस्कारसंय़ुक्तं तथ्यमात्महितं शुभम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
प्रीतिस्त्वय़ि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शय़िष्यति ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
प्रीतिय़ुक्तं च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतिय़ुक्तो नृपश्रेष्ठश्चचार विषय़ान्प्रिय़ान् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्महत्यो उवाच
प्रीते तु त्वय़ि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वरे प्रभो |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
प्रीते त्वय़ि महाभाग सर्वलोकाभिपूजिते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
प्रीतेः शोकः प्रभवति विय़ोगात्तस्य देहिनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
प्रीतेन चाहं विभुना सूर्येणोक्तस्तदानघ ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
प्रीतेनोक्तः सहस्रेण व्राह्मणानामहं प्रभो |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
प्रीतो दृष्ट्वैव तनय़ां ग्रामेण द्रविणेन च ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतो धर्मात्मजो राजा वभूवातीव भारत |
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
प्रीतो मधुरय़ा वाचा विश्वामित्रं महाद्युतिम् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
विदुर उवाच
प्रीतो राजन्पुत्रगणैर्विनीतै; र्विशोक एवात्मरतिर्दृढात्मा ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतोऽभवद्दुहितरं दत्त्वा तामभिमन्यवे ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
प्रीतोऽस्मि तव गोविन्द वृणु कामान्यथेप्सितान् |
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञ साध्वाचार गुणान्वित ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञे तपसा निय़मेन च ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
व्राह्मण उवाच
प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र वरश्च प्रतिगृह्यताम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
प्रीतोऽस्मि तव सत्येन भद्रं ते पुरुषोत्तम ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
प्रीतोऽस्मि ते महाप्राज्ञ व्रूहि किं करवाणि ते ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतोऽस्मि ते शुभे भक्त्या तपसा निय़मेन च ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
प्रीतोऽस्मि तेऽहमनेन स्तोत्रेण |
१५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतोऽस्मि दिष्ट्या हि पितृष्वसा नः; पृथा विमुक्ता सह कौरवाग्र्यैः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतोऽस्मि परमं भद्रे परिचारेण ते शुभे ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
प्रीतोऽस्मि पुत्र युध्यस्व जय़माप्नुहि पाण्डव |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
प्रीतोऽस्मि पुरुषव्याघ्र न भय़ं विद्यते तव |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
दशरथ उवाच
प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
व्रह्मो उवाच
प्रीतोऽस्मि वो निवर्तध्वं वरान्वृणुत पुत्रकाः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
प्रीतोऽस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्रीतोऽस्मि सुदृढं पुत्र कुरु युद्धं मय़ा सह ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
प्रीतोऽस्मीत्यव्रवीत्कर्णं वैरमुत्सृज्य भारत ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
व्रह्मो उवाच
प्रीतोऽस्म्यनेन ते शेष दमेन प्रशमेन च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतोऽहं प्रदिशाम्यद्य फलमावृत्तिलक्षणम् ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
सृञ्जय़ उवाच
प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
प्रीतौ स्वः |
७१ ग
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
प्रीतौ स्वस्तव शौचेन दीर्घमाय़ुरवाप्नुहि |
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
प्रीतौ स्वस्तवानय़ा गुरुवृत्त्या |
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैस्तव ह्यार्जवसम्भृतैः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
प्रीत्यर्थं तव चैतन्मे स्वर्गसन्दर्शनं कृतम् |
२५ क