chevron_left  पुरोहितोऽय़मस्माकमग्निहोत्राणिarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
पुरोहितोऽय़मस्माकमग्निहोत्राणि रक्षतु |
२ क
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
पुलस्त्यवचनाच्चैव पृथिवीमनुचक्रमे ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
पुलस्त्यस्तु वधात्तेषां रक्षसां भरतर्षभ |
१० क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
पुलस्त्यस्य तु यः क्रोधादर्धदेहोऽभवन्मुनिः |
१ क
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
पुलस्त्यस्य सकाशाद्वै सर्वमेतदुपश्रुतम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २५८
मार्कण्डेय़ उवाच
पुलस्त्यो नाम तस्यासीन्मानसो दय़ितः सुतः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
पुलहस्य मृगाः सिंहा व्याघ्राः किम्पुरुषास्तथा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
पुलाका इव धान्येषु पुत्तिका इव पक्षिषु |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
पुलिनत्रस्तविहगं विनिष्पतितपन्नगम् ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
पुलिन्दखशवाह्लीकान्निषादान्ध्रकतङ्गणान् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
पुलिन्दैः पारदैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
पुलोमस्य विनाशश्च च्यवनस्य च सम्भवः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
मातलिरु उवाच
पुलोमा नाम दैतेय़ी कालका च महासुरी |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
पुल्लिङ्गा इव नार्यस्तु स्त्रीलिङ्गाः पुरुषाभवन् |
५६ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
पुष्कर त्वं हि मे भ्राता सञ्जीवस्व शतं समाः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
पुष्करं च प्रभासं च नैमिषं सागरोदकम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
पुष्करं त्वन्यदेवात्र तथान्यदुदकं स्मृतम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पुष्करं नाम विख्यातं महाभागः समाविशेत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्करं पुष्कराक्षस्य तस्मै पद्मात्मने नमः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
पुष्करस्तु महाराज घोषय़ामास वै पुरे |
८ क
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भरद्वाज उवाच
पुष्कराद्यदि सम्भूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
पुष्करार्थं कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम |
२ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
पुष्करिण्यश्च विविधाः पद्मसौगन्धिकाय़ुताः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
पुष्करिण्यस्तडागानि कूपांश्चैवात्र खानय़ेत् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्करिण्यामृचीकस्य भुमन्योरभवन्सुताः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नमान् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पुष्करे स्नातमात्रस्य सर्वमेव प्रणश्यति ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
पुष्करेण हृतं राज्यं यच्चान्यद्वसु किञ्चन ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना |
४ क
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्करेप्सुमुपाय़ान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ गाथां सुकृतिनां वर ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्करेषु ततः शिष्टं कालं वर्तितवान्प्रभुः |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
पुष्करेषु द्विजातिभ्यः प्रादां गाश्च सहस्रशः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पुष्करेषु महाभाग देवाः सर्षिपुरोगमाः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
पुष्करेषु महाराज सर्वेषु च जलं स्पृश ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
पुष्करेष्ववसः कृष्ण त्वमपो भक्षय़न्पुरा ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
पुष्करैः पद्मसङ्काशैर्वर्ष्मवद्भिर्महाप्रभैः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
पुष्कलांश्च वरान्प्रादात्तव विद्वन्हृदि स्थितान् ||
८५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
पुष्टमस्माकमत्यन्तमभिकामं च नः सदा |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
पुष्टश्लिष्टाय़तभुजं सुविस्तीर्णघनोरसम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
पुष्टस्रोत इवाय़त्तः स्फीतो भवति सञ्चय़ः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
पुष्टास्तेऽश्वा भृता योधाः श्वो युध्यस्व सकेशवः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
पुष्टाय़तशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
पुष्टिकर्मविधानं च कर्तव्यं भूतिमिच्छता ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
पुष्टिकामोऽथ पुष्येण श्राद्धमीहेत मानवः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
पुष्टिराय़ुस्तथा वीर्यं श्रीश्चैव पितृवर्तिनः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्टिर्द्युतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिर्वृद्धिरुमा तथा |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
पुष्टो मानुषमांसेन दुर्वुद्धिः पुरुषादकः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
पुष्ट्यर्थं च स्वपुत्रस्य राजपुत्रस्य चैव ह ||
८ ख