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सभा पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावर्तत महाराज सुहृद्द्यूतमनन्तरम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत महारौद्रः सङ्ग्रामः शोणितोदकः |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तत महावेगा नदी रुधिरवाहिनी |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावर्ततैवं यज्ञः स पाण्डवस्य महात्मनः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
प्रावर्तन्त च वेदा वै शास्त्राणि च यथा पुरा ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भय़वेदिनः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तय़त सङ्ग्रामे शोणितोदां महानदीम् |
१२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
प्रावर्तय़न्त तच्छास्त्रं धर्मय़ोनिं सनातनम् ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तय़न्तं कुरुपुङ्गवांश्च; पुनः पुनश्च प्रणदन्तमाजौ ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावर्तय़न्नदीं घोरां शोणितौघतरङ्गिणीम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तय़न्नदीमुग्रां शोणितौघतरङ्गिणीम् ||
४७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
प्रावर्तय़ाम सङ्ग्रामं पाञ्चालैरेव केवलैः ||
९८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
प्रावर्तय़ेतां तौ युद्धं घट्टिताविव पन्नगौ ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
प्रावात्सपृषतो वाय़ुरनभ्रे स्तनय़ित्नुमान् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
प्रावात्सपृषतो वाय़ुरनभ्रे स्तनय़ित्नुमान् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
प्रावाद्यन्त महाराज पाण्डवानां निवेशने ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
प्रावाद्यन्समतिक्रान्ते तव पुत्रे धनञ्जय़म् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
प्रावादय़न्त संहृष्टाः पाण्डूनां तत्र सैनिकाः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
प्रावाराजिनमुख्यांश्च काम्वोजः प्रददौ वसु ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावासूत महाभागा देवी देवर्षितः पुरा ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
प्राविध्यत ततः शेषं सुतसोमो महारथः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
प्राविशंस्तावका राजन्हंसा इव महत्सरः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
प्राविशत्तद्वलं वालः सुपर्ण इव सागरम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
प्राविशद्धरणीं राजन्वल्मीकमिव पन्नगः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
प्राविशद्धरणीं राजन्वल्मीकमिव पन्नगः |
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
प्राविशद्भवनं राज्ञः पाण्डवस्य हलाय़ुधः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
प्राविशद्भवनं स्वं वै गृहीत्वा तं द्विजोत्तमम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
प्राविशद्भारतीं सेनां सङ्क्रुद्धो वै धनञ्जय़ः |
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
प्राविशद्भारतीं सेनामपर्यन्तां स सात्यकिः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
प्राविशन्कितवा मन्दाः सभां युधि दुरासदाम् |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
प्राविशन्धरणीमुग्रा वल्मीकमिव पन्नगाः ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
प्राविशन्नगरं हृष्टश्चतुर्भिः सह पाण्डवैः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
प्राविशन्मेदिनीं भीमाः क्रौञ्चं पत्ररथा इव ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्राविशन्सौवलानीकमभ्यतिक्रम्य तान्रथान् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
प्रावृट्काले महाराज विद्युद्भिरिव तोय़दः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
प्रावृषीव महाराज जलदाः पर्वतं यथा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रावृषीव महावाय़ोरुद्धतस्य विशां पते ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
प्रावृषीव महाशैलं सिषिचुर्जलदा नृप ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
प्रावृषीव यथा सिक्तस्त्रिशृङ्गः पर्वतोत्तमः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
प्रावृषीवातिवृष्टानि शृङ्गाणीव धराभृताम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
प्रावृषीवासितग्रीवो मज्जेत निशि निर्जने |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
प्रावेपत भय़ोद्विग्ना प्रवाते कदली यथा ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
प्रावेपत सुसन्त्रस्तः शापभीतस्तदा विभो ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
प्रावेपन्निव गात्राणि कर्णभीमसमागमे |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
प्रावेरय़त्कुपितः पाण्डुपुत्रो; यत्तत्कुरूणामनय़स्य मूलम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
प्रावेशय़त दुर्धर्षो यत्र यत्रैच्छदर्जुनः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
प्रावेशय़त्ततः कक्ष्यां तृतीय़ां राजवेश्मनः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
प्रावेशय़त्ततः कक्ष्यां द्वितीय़ां राजवेश्मनः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रावेशय़द्धुतवहं पतङ्गमिव मोहितः ||
६ ख