शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
पुष्ट्यर्थं चैव तस्येह जनस्यार्थं चिकीर्षति ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
पुष्ट्यर्थमेताः सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजसत्तम ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारय़ेत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
पुष्पकं च विमानं तत्पूजय़ित्वा स राघवः |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शय़न्वनम् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पगन्धवहैः पुण्यैर्वाय़ुभिश्चानुवीजितः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
पुष्पगुल्मलताकीर्णं कदलीषण्डशोभितम् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पतो मध्विव रसः कामात्सञ्जाय़ते सुखम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
पुष्पन्यास उपस्पृश्य न शोचेन्मरणं ततः ||
११४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पुष्पमूलफलाहारो व्रतेषु निय़मेषु च |
७३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पवत्सु ध्रुवा श्रीश्च पुष्पवन्तस्ततो वय़म् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
पुष्पवर्षाणि दिव्यानि तत्र तेषां महात्मनाम् |
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
पुष्पवर्षाणि विवुधा देवतूर्याण्यवादय़न् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
पुष्पवर्षैश्च दिव्यैस्तमवचक्रुर्दिवौकसः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पवृष्टिं विचित्रां स्म व्यसृजंस्ते पुनः पुनः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पुष्पवृष्टिः शुभा गन्धाः शङ्खदुन्दुभिनिस्वनाः |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
पुष्पवृष्टिः शुभा तात पपात मम मूर्धनि ||
१६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
पुष्पवृष्ट्याभिवर्षन्ती गन्धैर्वहुविधैस्तथा |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
पुष्पवेष्टितशाखाग्रैर्गन्धवद्भिर्मनोरमैः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
पुष्पसंमोदने काले वाशतां सुमनोहरम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पहेतोः कथं न्वार्यः करिष्यति युधिष्ठिरः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पाणां भरतश्रेष्ठ दिव्यानां दिव्यगन्धिनाम् ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पाणामुदकुम्भस्य चार्थे गत इति प्रभो ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पुष्पाणि च सुगन्धीनि रसवन्ति फलानि च ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
पुष्पाणि तानि दृष्ट्वाथ तदाङ्गेन्द्रवराङ्गना |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः; पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुचिः |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
पुष्पाणीव विचिन्वन्हि सोत्तमाङ्गान्यपातय़त् ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
पुष्पाण्योषधय़श्चैव रोरूय़न्ते सहस्रशः ||
५७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
पुष्पाननः पिङ्गलकः शोणितोदः प्रवालकः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
पुष्पार्थे चोदय़ामास गच्छ गच्छेति भारत ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पाहारः प्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
पुष्पाहारमिह प्राप्तं निवोधत निशाचराः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
पुष्पितस्येव फेनस्य पर्यन्तमनुवेष्टितम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पय़न्तीह मानवान् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतुः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
पुष्पितान्कर्णिकारांश्च तत्र तत्र ददर्श ह ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
पुष्पिताविव रेजाते वने शल्मलिकिंशुका |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
पुष्पितैः किंशुकै राजन्संस्तीर्ण इव पर्वतः ||
१५ ग
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पितैः पङ्कजैश्चित्रां कूर्ममत्स्यैश्च शोभिताम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पितैः पादपैः कीर्णमतीव सुखशाद्वलम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
पुष्पे पुष्पं यदा राजन्फले फलमुपाश्रितम् |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पेण प्रय़ता स्नाता निशि कुन्ति चतुष्पथे |
३४ क