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वन पर्व
अध्याय २३२
युधिष्ठिर उवाच
प्रसक्तानि च वैराणि ज्ञातिधर्मो न नश्यति ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
प्रसक्तान्पततोऽद्राक्ष्म भारद्वाजस्य साय़कान् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
प्रसक्तास्त्वां निरीक्षन्ते पुमांसं कं न मोहय़ेः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसङ्ख्यातुं महीपाल गुणभूतमनन्तकम् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसङ्ख्याय़ च सौक्ष्म्येण गुणदोषान्विचक्षणः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
प्रसज्य पाण्डवैर्वैरं योत्स्यते नात्र संशय़ः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६७
कण्व उवाच
प्रसन्न एव तस्याहं त्वत्कृते वरवर्णिनि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
प्रसन्नं ह्यप्रसन्नं वा पीडितं हृतमेव वा |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नः पूजितः पार्थैः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
प्रसन्नचेतसो ह्याशु वुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
प्रसन्नभाः पावक ऊर्ध्वरश्मिः; प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
प्रसन्नभाः पावक ऊर्ध्वरश्मिः; प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
प्रसन्नभाः समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्ज्वलः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नभ्रुकुटिः श्रीमान्कृता शान्तिः कुलस्य नः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नमनसः सर्वे गाङ्गेय़ं कुरुसत्तमाः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नमनसः सर्वे पुण्या वाचो विमुञ्चत |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहङ्कृताः |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १३१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽभ्यवर्तन्त पाण्डवान् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वेन्द्रिय़सुसंय़तः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ||
१३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
प्रसन्नसलिलः काले यथा स्यात्सागरो नृप ||
७५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नसलिला जज्ञे यथा पूर्वं तथैव हि |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
प्रसन्नसलिलैश्चापि ह्रदैश्चित्रैर्विभूषितम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
प्रसन्नस्त्वां महाराज संवर्तो याजय़िष्यति ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
प्रसन्नस्य च मे तात पश्य व्युष्टिर्यथाविधा ||
३४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
प्रसन्नहृदय़ाश्चैव सर्वसत्त्वेषु नित्यशः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमक्षय़मश्नुते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नात्मात्मनो नाम्नां निरुक्तं गुणकर्मजम् ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
प्रसन्ने च पुनः स्वस्थं स प्रसन्नोऽस्य वीर्यवान् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
प्रसन्नैरिन्द्रिय़ैर्यद्यत्सङ्कल्पय़ति मानसम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
प्रसन्नैर्मानसैर्युक्ताः पश्यन्त्येतानि वै द्विजाः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
प्रसन्नो यस्य मेऽद्य त्वं भूतभव्यभवत्प्रभुः ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसन्नो हि सुखाय़ स्यादुभय़ोरेव केशवः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
प्रसन्नोऽहं तवाद्येह विश्वमूर्तिरिहाव्ययः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
प्रसन्नोऽहं वरं तस्मादमरत्वं ददानि ते ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
प्रसभः कालकाक्षश्च मय़ापि दितिजा हताः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्रसभमिह विलोक्य को हरे; त्पुरुषवरावरजामृतेऽर्जुनात् ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसमीक्ष्य भवानेतद्वक्तुमर्हति केशव |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसमीक्ष्य महाभागा गाङ्गेय़ं वाक्यमव्रवीत् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसमीक्ष्य महावाहुश्चक्रे सेनापतींस्तदा ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
प्रसर्पमाणा मेदिन्यां ते व्यरोचन्त मार्गणाः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रसवश्चैव युवय़ोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
कृशतनुरु उवाच
प्रसवे चैव नारीणां वृद्धानां पुत्रकारिता |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
प्रससाद किल व्रह्मा स्वय़मेवात्मनात्मवान् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रससार वसन्ताग्रे वनानामिव पुष्पिताम् ||
१४ ख