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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
वृहस्पतिरु उवाच
पृथगेत्य समश्नाति नेदमद्य यथाविधि |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
पृथगेवानुलिम्पेत केसरेण च वुद्धिमान् ||
८० ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
पृथगेवाभ्यधावन्त पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄन्पतीन् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
पृथग्गणस्य भिन्नस्य विमतस्य ततोऽन्यथा |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
पृथग्जनस्य कुडकाः स्तनपाः स्तेनवेश्मनि |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथग्जनेन दृश्यन्त तास्तदा निहतेश्वराः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
पृथग्जनैरलभ्यं यद्भोजनाच्छादनं परम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
पृथग्ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपलभ्यते ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
यय़ातिरु उवाच
पृथग्धर्माः पृथक्षौचास्तेषां तु व्राह्मणो वरः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
पृथग्धर्मास्त्वेकवेदा धर्ममेकमनुव्रताः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
पृथग्धर्मैः समर्चन्ति तस्मै धर्मात्मने नमः ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
पृथग्भावश्च विज्ञेय़ः सहजश्चापि तत्त्वतः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
पृथग्भूतं यदा वुद्ध्या मनो भवति केवलम् |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
पृथग्भूतस्ततो नित्यमित्येतदविचारितम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
पृथग्भूताः पाण्डवानां पाञ्चालानां रथव्रजाः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
पृथग्भूतानि चान्यानि यानि देवार्पणानि वै |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
पृथग्भूतेषु सृष्टेषु चतुर्ष्वाश्रमकर्मसु |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रय़ुक्तौ च सर्वदा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रय़ुक्तौ च सर्वदा |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
पृथग्रूपौ समार्छन्तौ क्रोधं युद्धे परस्परम् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
पृथग्वलविधानं च तल्लोकं परिरक्षति ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
पृथग्वा यदि वा मिश्राः कर्तव्या नात्र संशय़ः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६७
दुःषन्त उवाच
पृथग्वा यदि वा मिश्रौ कर्तव्यौ नात्र संशय़ः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
पृथग्वादाश्च वर्तन्ते चत्वरेषु सभासु च ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
पृथग्विधान्भूतसङ्घांश्च विश्वां; स्त्वत्सम्भूतान्विद्म सर्वांस्तथैव |
६७ ख
वन पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
पृथग्व्यालमृगाणां च पक्षिणां चैव सर्वशः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथां कृष्णां च सहिते विनय़ेनाभिजग्मतुः |
२ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
वैशम्पाय़न उवाच
पृथां परिददौ तस्मै द्विजाय़ सुतवत्सलः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
पृथापि सहदेवेन सहास्ते नकुलेन च ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
पृथामामन्त्र्य गोविन्दः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
पृथामेव तु शोचामि या पुत्रैश्वर्यमृद्धिमत् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
धृतराष्ट्र उवाच
पृथारणिसमुद्भूतैस्त्रिभिः पाण्डववह्निभिः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
पृथाय़ा न कृतः कामस्तेन चापि महात्मना |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
पृथिवी काश्यपी जज्ञे सुता तस्य महात्मनः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
पृथिवी काश्यपोऽग्निश्च प्रकृष्टाय़ुश्च भार्गवः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै ||
७४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमतः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
पृथिवी चात्र सङ्घातः शरीरं पाञ्चभौतिकम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
पृथिवी चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि ग्रहास्तथा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
पृथिवी तस्य राष्ट्रं च यस्य भीमो महारथः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
पृथिवी दक्षिणा चात्र विधिः प्रथमकल्पिकः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
पृथिवी दक्षिणा यस्य सोऽश्वमेधो न विद्यते ||
१६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
पृथिवी देश इत्युक्तः कालः स च न दृश्यते |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पृथिवी द्यौर्दिशश्चैव पादपाश्च जनाधिप ||
११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
पृथिवी धर्मराजस्य शमेनैव प्रदीय़ताम् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
पृथिवी निर्भय़ा देव त्वत्प्रसादात्सदाभवत् |
६२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
पृथिवी निहता सर्वा सहय़ा सरथद्विपा ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
पृथिवी पञ्चमं भूतं घ्राणश्चाध्यात्ममिष्यते |
३१ क