chevron_left  प्रस्थितःarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
प्रस्थितः सुमहातेजा दुर्वासा वह्निवज्ज्वलन् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
प्रस्थितस्य च कर्णस्य निपेतुस्तुरगा भुवि |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
प्रस्थिता देवता दृष्ट्वा शैलराजसुता तदा |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थिताः स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छ्य परन्तपाः |
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
प्रस्थितानामिव समं पश्यामीह गतिं खग ||
६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थितान्द्रौपदीषष्ठान्पुरा द्यूतजितान्यथा ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थितान्वनवासाय़ ततो दुःशासनोऽव्रवीत् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थितो धनुराय़न्तुं वार्यतां साधु मा गमत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
प्रस्थितौ तत्सरो दिव्यं दिव्याश्चर्यशतैर्वृतम् ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
प्रस्थितौ सहधर्मिण्या महत्या दैत्यसेनय़ा ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
प्रस्थे हिमवतो रम्ये मालिनीमभितो नदीम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्नुतानां पय़ः षड्भिर्वदनैरपिवत्तदा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
राजो उवाच
प्रस्पन्दमानः सम्भ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते |
५ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
प्रस्रस्तवस्त्राभरणं स्फुरन्त; मुद्भ्रान्तचित्तं व्यसुमुत्ससर्ज ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
प्रस्वापं भीष्म मा स्राक्षीरिति कौरवनन्दन ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
प्रस्वापं मां प्रय़ुञ्जानं नारदो वाक्यमव्रवीत् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
प्रस्वापमस्त्रं दय़ितं वचनाद्व्रह्मवादिनाम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
प्रहतनररथाश्वकुञ्जरं; प्रतिभय़दर्शनमुल्वणं तदा |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
प्रहता हन्यमानाश्च पतिताश्चैव सर्वशः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
प्रहरद्भिर्महाराज स्वय़ंवर इवाहवे ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
प्रहरध्वमितः सर्वे मम गात्रे महारथाः |
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्रहरन्तो यथाशक्ति यावत्प्राणस्य धारणम् |
७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
प्रहरन्सर्वशत्रुभ्यः पाण्डवानां महारथः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
प्रहरस्व रणे वाल पश्यामस्तव पौरुषम् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रहरास्मै नरव्याघ्र न चेन्मोहात्प्रमुह्यसे ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
प्रहरास्मै नरव्याघ्र न चेन्मोहाद्विमुह्यसे ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
प्रहराहर जह्येनं स्मितक्ष्वेडितगर्जितैः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
प्रहरिष्यन्ति वन्धुभ्यः स्नेहमुत्सृज्य दूरतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
प्रहरिष्यन्प्रिय़ं व्रूय़ात्प्रहरन्नपि भारत |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
प्रहरिष्यन्प्रिय़ं व्रूय़ात्प्रहृत्यापि प्रिय़ोत्तरम् |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
प्रहरिष्यन्हृतो वाहुरदृश्येन किरीटिना |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं त्वं राम समास्थितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
प्रहरेन्न त्वविज्ञाय़ हत्वा शत्रून्न शेषय़ेत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
प्रहरेन्न नरेन्द्रेषु न गां हन्यात्तथैव च |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
प्रहर्ता मतिमाञ्शूरः श्रुतवाननृशंसवान् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहर्तुकामाः सम्पेतुराकाशात्कृष्णपाण्डवौ ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रहर्तुमशकत्तत्र भीष्मं भीमपराक्रमम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रहर्तुमैच्छत्तं चास्य प्रासं चिच्छेद लक्ष्मणः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
प्रहर्षं पाण्डवेय़ानां श्रुत्वा मम महद्भय़म् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
प्रहर्षं प्राप्य सेना तु तावकी भरतर्षभ |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः साम्यं स्वस्थात्मचित्तता |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
प्रहर्षमतुलं लेभे वासवः पृथिवीपते ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
प्रहर्षमतुलं लेभे विस्मय़ं च परं यय़ौ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
प्रहर्षेण च संविष्टा देवदर्शनकाङ्क्षय़ा ||
१२४ ग
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदय़त भारत ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
प्रहर्षय़ति मा भूय़ः सौभद्रः परवीरहा ||
२१ ख