chevron_left  प्रहर्षय़न्यदुव्याघ्रोarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
प्रहर्षय़न्यदुव्याघ्रो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ||
१११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
प्रहर्षय़ुक्तानि तु तानि राज; न्महान्ति नानाविधशस्त्रवन्ति |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
प्रहसंश्च पुनर्वाक्यं भीममाह वृषस्तदा ||
७७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहसंश्चाव्रवीद्वाक्यं चेदिराजः प्रतापवान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
प्रहसंश्चाव्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
प्रहसंश्चास्य चिच्छेद कार्मुकं रिपुभीषणम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
प्रहसंस्तु नरव्याघ्रः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
प्रहसञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा तथा वज्रसमाहतः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूय़न्त चापरे |
११२ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
उत्तर उवाच
प्रहसन्तु च मां नार्यो नरा वापि वृहन्नडे ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्तौ तथान्योन्यं भर्त्सय़न्तौ मुहुर्मुहुः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्देवकीपुत्रमिदं वचनमव्रवीत् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहसन्नव्रवीद्राजन्कुत्रागमनमित्युत ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहसन्नव्रवीद्राजा सङ्ग्रामे विगतक्लमः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहसन्निव कौन्तेय़ इदं वचनमव्रवीत् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्निव कौन्तेय़ः शरैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
९८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्निव तां चापि शरवृष्टिं जघान ह ||
४८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्निव पुत्रस्ते योद्धुकामः समाह्वय़त् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
पितो उवाच
प्रहसन्निव विप्राय़ स तस्मै प्रददौ तदा ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहसन्निव सर्वांस्तानेकैकं सोऽपसर्पति ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहसन्निव सेनानीरिदं वचनमव्रवीत् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्प्रतिजग्राह द्रोणपुत्रो महारणे ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्विशिखांस्तीक्ष्णानुद्यम्य परमास्त्रवित् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
अर्जुन उवाच
प्रहसिष्यन्ति वीर त्वां नरा नार्यश्च सङ्गताः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहस्य पुरुषव्याघ्रो रथस्यान्तिकमानय़त् ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
प्रहस्य पुरुषेन्द्रस्य शरैश्चिच्छेद कार्मुकम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
प्रहस्य भीमसेनस्तु कर्णं प्रत्यर्पय़द्रणे |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहस्य सहसा राजन्विप्रतस्थे ससौवलः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
प्रहस्य सहसाविध्यद्विंशत्या शिनिपुङ्गवम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
प्रहस्य सूतं वचनं वभाषे; शिनिप्रवीरः कुरुपुङ्गवाग्र्य ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
प्रहारगुरुपाताच्च मूर्छेव समजाय़त ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहारवेगाभिहताद्द्रुमाद्व्याघूर्णितास्ततः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहास इव विस्तीर्णः शुश्रुवे तस्य वेश्मनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
प्रहाय़ कामं लोभं च क्रोधं पारुष्यमेव च |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रहाय़ोभय़मप्येतज्ज्ञानं कर्म च केवलम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
प्रहितः सुहृदा राजन्प्रीय़ता वै प्रिय़ातिथिः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रहितां दुःखसंस्पर्शां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
प्रहितांस्तान्प्रय़त्नेन छित्त्वा द्रौणेरिषूनरिः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूतः क्षत्तारमव्रवीत् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो भृशम् |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
प्रहीणगुणकर्माणं केवलं विमलं स्थिरम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
प्रहृत्य च कृपाय़ेत शोचन्निव रुदन्निव ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
प्रहृत्यैकैकशस्तेभ्यो भविष्याम्यनृणः पितुः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रहृष्टं प्रेक्षते स्कन्दं न च ग्लाय़ति दर्शनात् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टं वाहनं कृष्ण पाण्डवानां प्रचक्षते |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टः शनकै राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
सञ्जय़ उवाच
प्रहृष्टमनसं ज्ञात्वा वासुदेवं महावलम् |
५ क