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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां ततो द्रोणोऽप्यकरोत्कदनं महत् |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां तथा मध्ये कर्णोऽचरदभीतवत् ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
पाञ्चालानां तु मुख्यौ तौ राजपुत्रौ महावलौ |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां ददद्धर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां नरव्याघ्रान्मत्स्यानां च नरर्षभान् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां नरव्याघ्रो यः ख्यातो जनमेजय़ः |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां महावीर्याः शिखण्डी च महारथः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां रथव्रातान्कर्णो द्रावय़ते तथा ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां वधं कृत्वा शान्तिं लव्धास्मि कौरव ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां सृञ्जय़ानां पाण्डवानां च यन्मुखम् |
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां सोमकानां मत्स्यानां च विशेषतः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानामधिपं चैव वृद्धं; धृष्टद्युम्नं पार्षतं याज्ञसेनिम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानामधिपो याज्ञसेनिः; सेनापतिं कर्णमार्च्छत्ससैन्यम् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
पाञ्चालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवैः सह ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानेव तु द्रोणो धृष्टद्युम्नपुरोगमान् ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कर्ण उवाच
पाञ्चालान्केकय़ांश्चैव वृष्णींश्चापि समागतान् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालान्केकय़ान्मत्स्यान्मागधान्वत्सभूमिपान् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्द्रौपदेय़ांश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्निहतान्दृष्ट्वा देवकल्पान्महारथान् |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्निहनिष्यन्ति रक्षिता दृढधन्वना |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्पाण्डवांश्चैव महद्भय़मथाविशत् ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्पाण्डवान्मत्स्यान्सृञ्जय़ांश्चेदिकेकय़ान् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्पाण्डवैः सार्धं करूषांश्चेति भारत ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्पुनराधावत्पश्यतः सव्यसाचिनः ||
४२ ग
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालान्येन सङ्ग्रामे भीमसेनोऽजय़त्प्रभुः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्विधमन्सङ्ख्ये सूतपुत्रः प्रतापवान् |
६४ क
सभा पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालान्विविधोपाय़ैः सान्त्वय़ामास पाण्डवः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पाञ्चालान्सपरीवाराञ्जघ्नुर्द्रौणिपुरोगमाः ||
१८१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३१
दुर्योधन उवाच
पाञ्चालान्सृञ्जय़ांश्चैव ये चान्ये तव सैनिकाः ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्सृञ्जय़ांश्चैव विनिकृत्तान्सहस्रशः |
१४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्सृञ्जय़ांश्चैव विनिघ्नन्निशितैः शरैः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्सृञ्जय़ान्पाण्डून्भारद्वाजः पुनः पुनः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्सृञ्जय़ान्मत्स्यान्केकय़ान्पाण्डवानपि |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
दुर्योधन उवाच
पाञ्चालान्सोमकांश्चैव जहि द्रौणे सहानुगान् |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालापसदश्चाद्य न मे जीवन्विमोक्ष्यते ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालापसदाद्य त्वां प्रेषय़िष्यामि मृत्यवे ||
२३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालापि महेष्वासा भग्ना भग्ना नरोत्तमाः |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाश्च नरव्याघ्राः समन्तात्तव वाहिनीम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालाश्च नरव्याघ्राश्चेदय़श्च निषूदिताः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाश्च मनोज्ञाभिर्वाग्भिः सूर्यमिवर्षय़ः ||
५० ग
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालाश्च यथा सर्वे निहताः सपदानुगाः |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाश्च सवार्ष्णेय़ाः पाण्डवाश्च विशां पते |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाश्चलिता धर्मात्क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय १
अर्जुन उवाच
पाञ्चालाश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटच्चराः |
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
शल्य उवाच
पाञ्चालाश्चेदय़श्चैव द्रौपदेय़ाश्च सर्वशः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालास्तं महेष्वासं प्रत्ययुध्यन्कथं रणे ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्तु महाराज त्वरिता विजिगीषवः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्तु विशेषेण द्रोणसाय़कपीडिताः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्त्वरिता द्रोणं समन्तात्पर्यवारय़न् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
पाञ्चालास्त्वानुय़ास्यन्ति शिखण्डी च महारथः |
२३ क