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आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मय़ा मतिमतां वर ||
६८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
प्रभवः प्रलय़ः स्थानं निधानं वीजमव्ययम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रभवः सर्वभूतानां शाश्वतः पुरुषोऽव्ययः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभवः सर्वभूतानामीशः शम्भुः प्रजापतिः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
प्रभवद्भिः पुरा दाय़ानर्हेभ्यः प्रतिपादितान् |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
प्रभवन्ति धनज्यानिनिर्मुक्तस्य निराशिषः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
सूर्य उवाच
प्रभवन्ति वरारोहे भद्रं ते शृणु मे वचः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५१
सूर्य उवाच
प्रभवन्तीह भूतानां प्राप्तानां परमां गतिम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
प्रभवन्तो व्यदृश्यन्त राजन्नाधिरथेः शराः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षय़ाय़ जगतोऽहिताः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
प्रभवन्पृच्छते यो हि संमानय़ति वा पुनः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
प्रभवन्योऽनहंवादी स वै पुरुष उच्यते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
प्रभवश्च प्रभावश्च नात्मसंस्थः कदाचन ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
प्रभवश्चापि धर्माणां धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
प्रभवश्चाप्ययश्चैव देवगुह्यानि भामिनि ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभवश्चैव सर्वेषां निधनं च युधिष्ठिर ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभवाप्ययवित्प्राज्ञो न कृच्छ्रेष्ववसीदति ||
१०२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
अष्टावक्र उवाच
प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वं शय़नं व्रज ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वय़म्भुवा |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
प्रभवार्थाय़ भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
प्रभविष्णुश्च कोशस्य जगतश्च तथा प्रभुः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
प्रभविष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
प्रभविष्यन्ति गाङ्गेय़ क्षुत्पिपासे न चाप्युत ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
प्रभवेच्च कुले पुण्ये सर्वपापं व्यपोहति |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
प्रभवो नाधिगन्तव्यः स्त्रीणां दुश्चरितस्य च ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभां समुत्सृजेदर्को धूमकेतुस्तथोष्णताम् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्नुन्मज्ज्य चन्द्रमाः ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
प्रभात उदिते सूर्ये ततो युद्धमवर्तत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
प्रभातमात्रे श्वोभूते केशवाय़ार्जुनाय़ वा |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां कृतपूर्वाह्णिकक्रिय़ौ |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां पुनरेव सुतस्तव |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां प्रातरुत्थाय़ वै नृपः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां भीष्मः शान्तनवस्ततः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां रजन्यां तु कर्णो राजानमभ्ययात् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां रजन्यां वै इदं युद्धं भविष्यति ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
प्रभाताय़ां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
व्राह्मण उवाच
प्रभाते यास्यति भवान्पर्याश्वस्तः सुखोषितः |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
प्रभाते राजसमितौ सञ्जय़ो यत्र चाभिभोः |
१४४ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रभाते लक्ष्मणं वीरमभ्यभाषत दुर्मनाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
प्रभाते वाय़ुमाय़ान्तं प्रत्यैक्षत वनस्पतिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
प्रभाते समदृश्यन्त निय़ताहारकर्शिताः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
प्रभाते सर्वसैन्यानामग्रे चक्रे धनञ्जय़म् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
प्रभावं नात्र पश्यामि पाण्डवानां कथञ्चन ||
६३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावं पौरुषं वुद्धिं जानामि तव शत्रुहन् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
मातो उवाच
प्रभावं पौरुषं वुद्धिं जिज्ञासन्त्या मय़ा तव |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
प्रभावं विनय़ं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि च |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रभावं सुव्रतत्वं च सिद्धिं योगस्य चातुलाम् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
प्रभावः सर्वगो वाय़ुरर्यमा सविता रविः |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
प्रभावकालावधिकौ यदा मन्येत चात्मनः |
६ क