शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तमकुर्वाणैर्नैतैरर्हति संविदम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
प्राय़श्चित्तमकृत्वा तु प्रेत्य तप्तासि भारत ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तमहं कृत्वा पुनात्युभय़तो दश ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
प्राय़श्चित्तविधानेन सर्वमेतेन शुध्यति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तविधिं चात्र जपहोमांश्च तद्विदः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तहतं पापं तथा सद्यः प्रणश्यति ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
प्राय़श्चित्तानि वक्ष्यामि विस्तरेणैव भारत ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़श्चित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेऽनघ |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तीय़ते चापि विधिदृष्टेन हेतुना ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
प्राय़श्चित्तीय़ते ह्येवं नरो मिथ्या च वर्तय़न् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
प्राय़श्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामस्य चेष्यते ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
प्राय़श्चित्तेषु मां व्रह्मञ्शान्तिमङ्गलवाचकाः |
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
प्राय़ाचत नृपः शुल्कं भगवन्तं विभावसुम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ाचत वरं यं मां नरकार्थाय़ तं शृणु ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ाच्छ्वोभूते सगणः सानुय़ात्रः; सह स्त्रीभिर्द्रौपदीमादिकृत्वा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ातां तत्र राजेन्द्र यत्र शल्यो व्यवस्थितः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ात्ततः सारथिरुग्रवेगो; यतो भीमस्तद्वलं गन्तुमैच्छत् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ात्ततस्तु त्वरितो दारुकेण सहाच्युतः ||
७० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ात्तेन रणे राजन्येन द्रोणोऽन्वय़ुध्यत ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ात्पाञ्चालपाण्डूनां सैन्यानि प्रहसन्निव ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ात्पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ात्पुनर्महावाहुराचार्यस्य रथं प्रति |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ात्प्राचीं दिशं राजन्दीप्यमानः स्वतेजसा ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
प्राय़ात्रिकं चानय़ताशु सर्वं; कन्याः पूर्णं वीरकांस्यं च हैमम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ात्स शनकैर्वीरो धनञ्जय़रथं प्रति ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ात्स्वशिविरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय़ तं रथम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ादतिमहाघोरं यमक्षय़महोदधिम् |
१२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ादभिमुखः पार्थः सूतानीकानि मारिष ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राय़ादुत्तङ्कसहितो धुन्धोस्तस्य निवेशनम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
भीष्म उवाच
प्राय़ाद्गर्दभय़ुक्तेन रथेनेहाशुगामिना ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ाद्द्रुतममित्रघ्नो यत्र भीमो व्यवस्थितः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ाद्द्रोणरथप्रेप्सुर्युय़ुधानस्य पृष्ठतः ||
१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३२
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ाद्रासभय़ुक्तेन नगरं वारणावतम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ुङ्क्ताम्भस्ततस्तेन प्राय़शोऽस्त्रेण शोषितम् ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
प्राय़ुध्यन्त पुरस्कृत्य मातङ्गा इव यूथपम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ेण नीचा व्यसनेषु मग्ना; निन्दन्ति दैवं कुकृतं न तत्तत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
प्राय़ेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
प्राय़ेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
प्राय़ेण हि गृहस्थस्य ममत्वं नाम जाय़ते |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ोजय़दमेय़ात्मा भार्गवास्त्रं महावलः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
प्राय़ोपविष्टं जानीध्वमद्य मां गुरुघातिनम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ोपविष्टं राजानं दुर्योधनममर्षणम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ोपविष्टं राजानं धार्तराष्ट्रमिहानय़ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ोपविष्टस्तु नृप राज्ञां हास्यो भविष्यसि ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ोपविष्टाय़ रणे पार्थेन छिन्नवाहवे |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
प्राय़ोपविष्टे तु हते पुत्रे सात्यकिना ततः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
प्राय़ोपविष्टे नृपतौ मणिपूरेश्वरे तदा |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
प्राय़ोपवेशनाद्राज्यं सर्वत्र सुखमुच्यते |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
प्राय़ोपवेशने चैव हेतुं विस्तरतोऽव्रुवम् ||
५३ ख