अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
पय़सा हविषा दध्ना शकृताप्यथ चर्मणा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
पय़स्यन्तर्हितं सर्पिर्यद्वन्निर्मथ्यते खजैः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
पय़स्विनीं घृतिनीमत्युदारां; समृद्धिनीं वेगिनीं दुर्विगाह्याम् |
८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
पय़स्विनीनामथ रोहिणीनां; तथैव चाप्यनडुहां लोकनाथ |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
पय़स्विनीस्तथा धेनूर्यानानि शय़नानि च ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
पय़ांसि दधिसर्पींषि रसवन्ति हितानि च ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
पय़ो दधि घृतं चैव पुण्याश्चैताः सुराधिप |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
पय़ो दधि घृतं यासां सर्वपापप्रमोचनम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पय़ो न पिवति |
५० ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पय़ो न पिवसि |
४७ घ
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पय़ोदा गोमहिषदा सुविषाणा च भारत ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पय़ोभक्षो दिवं याति स्नानेन द्रविणाधिकः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
पय़ोमूलफलैर्वापि पितॄणां प्रीतिमाहरन् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
पय़ोऽनुपानं दातव्यमानृण्यार्थं द्विजातय़े ||
६ ख