भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
परिणाहेन षट्त्रिंशद्विपुलत्वेन चानघ |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
परितापोऽध्वगानां च राजसो गुण उच्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
परितापोऽपहरणं ह्रीनाशोऽनार्जवं तथा |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
अहल्यो उवाच
परितुष्टास्मि ते पुत्र नित्यं भगवता सह |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
परितुष्टोऽस्मि ते राजन्वरं वरय़ सुव्रत ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
परित्यक्तः सुतश्चाय़ं दुहितेय़ं तथा मय़ा |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
परित्यक्तश्च गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
परित्यक्ताश्च नश्यन्ति तेनेदं सर्वमावृतम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
परित्यक्तुं न शक्नोमि दानशक्तिश्च नास्ति मे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
परित्यक्तुं न शक्नोमि दुर्योधनमचेतनम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्यां नित्यमनुव्रताम् ||
३३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
परित्यक्तुमहं वन्धुं स्वय़ं जीवन्नृशंसवत् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभय़ं नरः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
परित्यजति यो दुःखं सुखं वाप्युभय़ं नरः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
परित्यजति वार्ष्णेय़ं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
परित्यजध्वं राजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभय़ं नराः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
परित्यजामि काम त्वां हित्वा सर्वमनोगतीः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
भीम उवाच
परित्यजेत को न्वद्य प्रभवन्निव राक्षसि ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
परित्यजेय़ं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
परित्यज्य क्षय़मिह अक्षय़ं धर्ममास्थितः ||
५२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
परित्यज्य गताः शूराः प्रेतराजनिवेशनम् ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
परित्यज्य च पाञ्चालं प्रय़ाता यत्र सौवलः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
परित्यज्य निषेवेत तथेमान्योगसाधनान् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
परित्यज्य प्रिय़ानन्ये वान्धवान्वान्धवप्रिय़ |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
परित्यज्य प्रिय़ान्प्राणान्धनार्थं हि महाहवम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
परित्यज्य प्रिय़ान्प्राणान्रणे विचर वीरवत् |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
परित्यज्य भवेत्त्यागी न यो हित्वा प्रतिष्ठते ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
परित्यज्य रणे द्रौणिं व्यद्रवन्त दिशो दश ||
१९ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
परित्यज्य वनं यातु नानेनार्थोऽस्ति कश्चन ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
परित्यज्यामिषं सर्वं मृषावादात्प्रमोक्ष्यसे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
परित्यज्यामिषं सौम्य दुःखतापाद्विमोक्ष्यसे ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
परित्यागं हि पुत्रस्य न प्रशंसन्ति साधवः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
परित्याज्यो वुधैः पापः कृतघ्नो निरपत्रपः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
परित्राणं च कर्तव्यमार्तानां पृथुलोचन |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
परित्राणं च भीतानां सर्पाणां व्राह्मणादपि |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
परित्राणाय़ भवतां प्रार्थय़िष्ये धनानि वः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
परित्राणाय़ साधूनां विनाशाय़ च दुष्कृताम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
शकुनिरु उवाच
परित्रातुं महेष्वासान्मद्रराजपदानुगान् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कर्ण उवाच
परित्रातुमिह प्राप्तो यदि पार्थं पुरन्दरः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
परित्राय़न्तु मां नित्यं भजमानामनिन्दिताम् |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
परित्राय़स्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
नहुष उवाच
परित्राय़स्व मामस्माद्विषय़ं च कुलं च मे ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
परिदाय़ नृपं तेभ्यः सङ्ग्रामश्चाभवद्यथा ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
परिदृष्टानि तीर्थानि गङ्गा चैव मय़ा नृप ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
परिदृष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिणः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
परिदृष्टेषु चाहःसु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
परिदेवति तान्वीरान्धृतराष्ट्रो महीपतिः |
३ क