वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
परिवृत्तेऽहनि ततः प्रकीर्णहरिणे वने |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
परिवृत्तो हि भगवान्सहस्रांशुर्दिवाकरः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
परिवेत्ता प्रय़च्छेत परिवित्ताय़ तां स्नुषाम् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
परिवेत्ता भवेत्पूतः परिवित्तिश्च भारत ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
परिवेषमनुप्राप्तो यथा स्याद्व्योम्नि चन्द्रमाः |
९२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
परिवेषस्तथा घोरश्चन्द्रभास्करय़ोरभूत् |
१० क
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
परिवेषाश्च दृश्यन्ते दारुणाः चन्द्रसूर्ययोः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
परिवेषो महांश्चापि सविद्युत्स्तनय़ित्नुमान् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
परिवेष्टनमेतेषां क्षिप्रं चैव व्यपानुद ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
परिवेष्टाग्निहोत्रस्य भवेन्नासंस्कृतस्तथा |
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
परिव्रजति यो युक्तस्तस्य धर्मः सनातनः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
परिव्रजन्तं स्थूलाङ्गं परिव्राजं शुनःसखम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषाय़वाससः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
व्राह्मणा ऊचुः
परिव्राजकरूपेण हितं तस्य चिकीर्षति ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
परिव्राजकानां पुनराचारस्तद्यथा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
पशुसख उवाच
परिव्राट्कामवृत्तोऽस्तु यस्ते हरति पुष्करम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
वसिष्ठ उवाच
परिव्राट्कामवृत्तोऽस्तु विसस्तैन्यं करोति यः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२९
युधिष्ठिर उवाच
परिशङ्कितमुख्यस्य स्रुतमन्त्रस्य भारत |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
परिशुष्कमांसत्वक्स्नाय़ुं जटाचीरधरं प्रभुम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
परिश्रमस्ते न भवेन्नृपात्मजे; निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्तं गतं भूमौ कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्तवलस्तात नैष मुच्येत किल्विषी ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्तश्च नकुलः सहदेवश्च भारत |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्ता हय़ाश्चास्य हय़यन्ता च माधव |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्ते विदीर्णे च भुञ्जाने चापि शत्रुभिः |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
परिश्रान्तो यदासीत्स ददद्दानान्यनेकशः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्तो युधां श्रेष्ठः सम्प्राप्तो भूरिदक्षिणम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
परिश्रान्तो वय़ःस्थश्च षष्टिवर्षो जरान्वितः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
परिश्रुतः कोकनदः प्रिय़माल्यानुलेपनः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तय़िष्यामि यामहम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
परिष्वक्तश्च पुण्येन वाय़ुना पुण्यगन्धिना ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
परिष्वक्तश्च सस्नेहं मृगेन्द्रेण पुनः पुनः ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
परिष्वक्तस्तु कौन्तेय़ो धर्मराजेन भारत |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वक्तस्य तस्याशु भ्रात्रा भीमस्य भारत |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वक्तो भृशं ताभ्यां यमाभ्यामभिवादितः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वजतु वाहुभ्यां भीमः प्रहरतां वरः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
परिष्वजिष्ये राजानं धर्मात्मानं न संशय़ः ||
७२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
परिष्वजेथा राजानं वाह्लिकं सुमहारथम् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
परिष्वजेथाः कल्याणि तत इष्टमवाप्स्यथः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य गुडाकेशं द्रौपदीं पर्यसान्त्वय़त् ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च गान्धारी कृपणं पर्यदेवय़त् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च गोविन्दं पुरा सुचरिते सखा ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्नेहविक्लवः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च तां प्रीतो विससर्ज गृहान्प्रति ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च मां कण्ठे स्नेहेनाक्लिन्नलोचनः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
परिष्वज्य च राजानं युधिष्ठिरमभाषत ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य च वाहुभ्यां प्रस्नवैरभिषिच्य च |
२३ ख