शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
परिष्वज्य तदा रामः पाण्डवान्सृञ्जय़ानपि |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य न्यवर्तन्त सानुय़ात्राः परन्तपाः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्य महातेजा वचनं वदतां वरः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
परिष्वज्य महावाहुर्वैश्यापुत्रं व्यसर्जय़त् ||
८० ग
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
परिष्वज्य महासेनं पुत्रवत्पर्यरक्षत ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
परिष्वज्य सुतं चापि सोऽऽत्मनः सदृशं गुणैः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्याव्रवीच्चैनं भुजाभ्यां स महाभुजः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्याव्रवीत्प्रीत इष्टोऽर्थो गृह्यतामिति ||
११ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
परिसंवार्य चास्त्राणि भीष्ममुक्तानि संय़ुगे |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
परिसङ्ख्याय़ कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
परिसर्पिणां तु सर्वेषां ज्येष्ठः सर्पो द्विजोत्तमाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
परिसस्रुर्महाशव्दाः प्रकर्षन्त्यो महीरुहान् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
परिसान्त्वय़ वीभत्सुं जय़माशाधि चानघ ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
परिस्कन्दा रथस्यास्य सर्वतोदिशमुद्यताः ||
७९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
परिस्तीर्य जुहावाग्निमाज्येन विधिना तदा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
परिस्तोमानि चित्राणि कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
परिस्तोमाश्च प्रासाश्च ऋष्टय़श्च महाधनाः ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
परिस्तोमैः कुथाभिश्च कम्वलैश्च महाधनैः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
परिस्रवन्नलो दृष्ट्वा शोकार्त इदमव्रवीत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
परिस्रवेच्च सततं नौर्विशीर्णेव सागरे ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
परिहारेण तद्व्रूय़ाद्यस्तेषां स्याद्व्यतिक्रमः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
परिहासश्च भृत्यैस्ते न नित्यं वदतां वर |
४८ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
परिहासेप्सय़ा वाक्यं विराटस्य निशम्य तत् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
परिहीनक्रिय़श्चापि दुर्वलत्वमुपेय़िवान् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
परिहीय़ेत किं तस्य यदि जीवेत्स पार्थिवः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
परिहृत्य श्मशानानि देवताय़तनानि च |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
परीक्षमाणः पार्थानां कलापानि धनूंषि च |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
परीक्षार्थं भगवतां कृतमेतन्मय़ानघाः |
७८ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
इन्द्र उवाच
परीक्षार्थं मय़ैतत्ते वाक्यमुक्तं धनञ्जय़ |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
परीक्षितगुणान्नित्यं प्रौढभावान्धुरन्धरान् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
परीक्षितश्च वहुधा सक्तूनादद्मि ते ततः ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
परीक्षितैर्वहुविधं स्वराष्ट्रेषु परेषु च ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
परीक्षितो मे वहुशो वाहुको नलशङ्कय़ा |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
परीक्षेत कुलं राजन्भोजनाच्छादनेन च ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
परीक्षेत तथा शिष्यानीक्षेत्कुलगुणादिभिः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
परीक्ष्य च यथान्याय़ं वेतनेनोपपादितम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
परीक्ष्य च यथान्याय़ं वेतनेनोपपादितम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
परीक्ष्य ज्ञापय़न्ह्यर्थान्न पश्चात्परितप्यते ||
६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
परीक्ष्य निपुणं वुद्ध्या युधिष्ठिरमभाषत ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रिय़ेषु प्रिय़ेषु च ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
परीक्ष्य सञ्चरेद्विद्वान्यथावच्छास्त्रचक्षुषा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
परीक्ष्यकारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
परीक्ष्यकारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
परीक्ष्यकारिणोऽर्थाश्च तिष्ठन्तीह युधिष्ठिर |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
परीक्ष्यकारी युक्तस्तु सम्यक्समुपपादय़ेत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
परीक्ष्यतां यथा स्याव नावामिह विगर्हितौ ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
परीक्ष्यास्ते महाराज स्वे परे चैव सर्वदा ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
परीतकालानिव नष्टसञ्ज्ञा; न्मोहोपेतांस्तव पुत्रान्निशम्य ||
४३ ग
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
परीतमग्निना राजन्नाकम्पत यथा गिरिः ||
२६ ख