वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्निरालम्वः पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्महातेजा ज्वलनादित्यसंनिभः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्महाय़ोगी तस्थौ मौनव्रतान्वितः ||
३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्विशालाय़ां वदर्यां मधुसूदन |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्विशालाय़ां वदर्यां स नराधिपः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ऊर्ध्ववाहुश्चतुर्थं तु मासमस्मि स्थितस्तदा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
ऊर्ध्ववाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिङ्गाक्ष्यो लम्वमेखलाः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वसस्याभवद्भूमिः सस्यानि फलवन्ति च |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिकाः स्मृताः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
ऊर्ध्वस्रोतस्तथा तिर्यगुत्पद्यति नराधिप |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वाङ्गुलिः स कण्डूय़न्धुन्वन्रूक्षाञ्शिरोरुहान् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
ऊर्ध्वाञ्चितशिरोग्रीवा प्रवभौ घोरदर्शना ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्मीतरङ्गैर्जाह्नव्याः समानीतामुपह्वरम् ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
ऊर्मय़श्चात्र दृश्यन्ते चलन्त इव पर्वताः |
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशय़नासने |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊषुः पित्रा सह रता गन्धमादनपर्वते ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुः प्रतीताः कुशसंस्तरेषु; यथाध्वरेषु ज्वलिता हव्यवाहाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः ||
३१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुर्नातिचिरं कालं व्राह्मणस्य निवेशने ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुर्महावने तात सिंहव्याघ्रगजाकुले ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुश्च सुचिरं कालं प्रच्छन्नाः पाण्डवास्तदा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा; नाराय़णस्थानगता नराग्र्याः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ऊषुस्तां रजनीं वीराः संस्पृश्य सलिलं शुचि |
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
ऊष्मणा सह विंशो वा सङ्घातः पाञ्चभौतिकः ||
३० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
ऊष्मतो ग्लानपर्णानां त्वक्फलं पुष्पमेव च |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ऊष्मपाः सुमहाभागास्तेषां भागाः प्रकल्पिताः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेय़ो योऽन्नं पचति देहिनाम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेय़ो योऽन्नं पचति देहिनाम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निर्भूतेषु लक्ष्यते |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
ऊष्मा प्रकुपितः काय़े तीव्रवाय़ुसमीरितः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
ऊष्माणं सर्वभूतानां सप्तार्चिषमथाञ्जसा ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
ऊहतुस्तौ वसून्याशु तान्यगस्त्याश्रमं प्रति |
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ऊहुः किंशुकपुष्पाणां तुल्यवर्णा हय़ोत्तमाः ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ऊहुः पार्थसमं युद्धे चाषपत्रनिभा हय़ाः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ऊहुः सुतुमुले युद्धे हय़ा हृष्टाः स्वलङ्कृताः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ऊहुरग्लानमनसश्चेकितानं हय़ोत्तमाः ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ऊहुर्दश महाराज कृच्छ्रादिव महाधनम् ||
१७ ख