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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पञ्च ह्येतानि मुख्यानां रथानां रथसत्तम |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
पञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभिः परिवृंहितम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
पञ्चकारणसङ्ख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चकृत्वस्त्वय़ा उक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
पञ्चकृत्वस्त्वय़ा उक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
पञ्चचूडाप्रभृतय़ो भृशमुत्फुल्ललोचनाः ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चतारेण संय़ुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पञ्चत्रिंशतिसाहस्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
पञ्चत्वमगमत्सौतिर्द्वितीय़ेऽहनि दारुणे ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
पञ्चत्वमगमद्राजा वज्राहत इव द्रुमः ||
१८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चत्वमगमद्वीर यथा तन्मे निवोध ह ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५४
युधिष्ठिर उवाच
पञ्चद्रौणिक एकैकः सुवर्णस्याहतस्य वै |
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
पञ्चधा तु भवेत्कार्यं वैश्यस्वं भरतर्षभ |
५३ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
पञ्चपर्वतमध्यस्था नदीवाकुलतां गता ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिः सर्वांस्तानविध्यच्छितैः शरैः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिर्वाणैः पुनर्विव्याध सात्यकिः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिर्वाणैरभ्यघ्नन्सर्वतः समम् ||
५६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिर्वाणैरेकैकं प्रत्यवारय़त् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिर्विद्ध्वा घोरं नादं ननाद ह ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिश्चास्य विव्याध चतुरो हय़ान् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः पञ्चभिस्तूर्णं संय़ुगे निशितैः शरैः |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
पञ्चभिः सततं यज्ञैः श्रद्दधानो यजेत च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
पञ्चभिः सततं यज्ञैर्विघसाशी यजेत च ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः सहदेवस्तु नकुलो दशभिः शरैः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः साय़कैर्हृष्टस्तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः साय़कैस्तूर्णं विव्याधोरसि भारत ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिः साय़कैस्तूर्णं सोमदत्तमविध्यत ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चभिः सूर्यसङ्काशैः सूर्येण च विराजता |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय १९५
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चभिर्दिवसैर्हन्तुं स सैन्यं प्रतिजज्ञिवान् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्द्रोणपुत्रस्तु स्वय़ं द्रोणश्च सप्तभिः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्निशितैर्भल्लैर्जत्रुदेशे समार्दय़त् ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्निशितैर्वाणैरथैनं सम्प्रजघ्निवान् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्निशितैर्वाणैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्नृपतिं चापि धर्मराजोऽर्दय़द्भृशम् ||
४१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्भरतश्रेष्ठ तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थैर्द्रोणः परिवृतो वभौ |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिर्मनुजव्याघ्रैर्गजैः सिंहशिशुं यथा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भरद्वाज उवाच
पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजङ्गमाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
पञ्चभिर्विधिभिः पार्थ न त्वय़ा विद्यते समः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
पञ्चभिश्च महाय़ज्ञैः श्रद्दधानो यजेत ह ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिश्चातिवेगेन विव्याध पुरुषर्षभम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
पञ्चभिस्तस्य विव्याध हय़ान्सूतं च साय़कैः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समन्वितम् |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
पञ्चभूतगुणैर्हीनममूर्तिमदलेपकम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
पञ्चभूतपरित्यक्तं शून्यं काष्ठत्वमागतम् |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
पञ्चभूतमय़ो यज्ञो नृय़ज्ञश्चैव पञ्चमः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
पञ्चभूतसमाय़ुक्तं नवद्वारं द्विदैवतम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
पञ्चभूतसमुद्भूतं लोकं यश्चानुपश्यति |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
पञ्चभूतात्मके देहे सत्त्वराजसतामसे |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चभूतात्मभूताय़ भूतादिनिधनात्मने |
५३ क