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वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
पलाशकेषु पुण्येषु रम्येष्वय़जताभिभूः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
पलाशफलमूलाशा वाय़ुभक्षाः सुसंय़ताः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
पलाशवृन्तिकामेकां सहितान्वहतः पथि ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
पलाशषण्डे चैतस्मिन्पन्था व्यावर्तते द्विधा |
१०७ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पलाशिनीं पापहरां महेन्द्रां पिप्पलावतीम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
पलाशैररिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
पलाशैस्तिलकैश्चूतैश्चम्पकैः पारिभद्रकैः |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
पलाय़तां दिशस्तेषां स्वानप्युत्सृज्य वान्धवान् |
९७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
पलाय़ध्वं कुरवो नैतदस्ति; सेन्द्रा देवा घ्नन्ति नः पाण्डवार्थे |
४१ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
पलाय़नकृतोत्साहः प्राद्रवद्येन वै वनम् ||
५६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
पलाय़नकृतोत्साहा दुद्रुवुः सर्वतोदिशम् ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
पलाय़नकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जय़े |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
पलाय़नकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जय़े ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
पलाय़ने कृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जय़े ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
पलाय़ने कृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जय़े ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
पलाय़ने कृतोत्साहान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
पलाय़ने तव मतिः सङ्ग्रामाद्धि प्रवर्तते ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
पलाय़न्तस्तत्र तत्र तौ वीरौ पर्यधावताम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
पलाय़मानः कृपणं दीनात्मा दीनपौरुषः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
पलाय़मानांश्च कुरून्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ||
९७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
पल्लीघोषान्समृद्धांश्च वहुगोकुलसङ्कुलान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
पल्वलानि च रम्याणि तथारण्यानि सर्वशः ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
स्थाणुरु उवाच
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोलपम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ६१
वृहदश्व उवाच
पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः |
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
पवन त्वं वने क्रुद्धो दर्शय़ात्मानमात्मना ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
पवनधुतपताका ह्रादिनो वल्गिताश्वा; वरपुरुषनिय़त्तास्ते रथाः शीघ्रमीय़ुः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
पवनश्चैव निःश्वासस्तेजोऽग्निर्निम्नगाः सिराः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पवनस्य ह्रदं गत्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम् |
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
पवनाच्च महद्व्योम तस्मात्परतरं मनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
पवनालम्विभिर्मेघैः परिष्वक्तं समन्ततः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः |
१३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
पवित्रं परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम् |
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
पवित्रं परमं मन्त्रः सर्वभावकरो हरः ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
पवित्रं परमं ह्येतत्पावनानां च पावनम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
पवित्रं मङ्गलं पुण्यं कल्याणमिदमुत्तमम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
पवित्रं शुच्यथाय़ुष्यं पितॄणामक्षय़ं च तत् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पवित्रपाणिः सावर्णिर्भालुकिर्गालवस्तथा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
पवित्रभूतां लोकस्य शुभामद्भुतदर्शनाम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
पवित्रमग्र्यं जगतः प्रतिष्ठा; दिवौकसां मातरोऽथाप्रमेय़ाः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
पवित्रमासनं चैव वृसीं च समुपानय़त् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
पवित्रश्च महांश्चैव निय़मो निय़माश्रय़ः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पवित्रां कुण्डलां सिन्धुं वाजिनीं पुरमालिनीम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
पवित्राणां पवित्रं च यत्तद्व्रूहि ममानघ ||
१० ख