अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
युधिष्ठिर उवाच
पवित्राणां पवित्रं यच्छ्रेष्ठं लोके च यद्भवेत् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
पवित्राणां पवित्रं हि कनकं द्विजसत्तम |
८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतां वर |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
पवित्रो मङ्गलीय़श्च ख्यातो लोके सनातनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
पशवश्च मनुष्याश्च द्रुमाश्चौषधिभिः सह |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
पशवश्चाथ धान्यं च यज्ञस्याङ्गमिति श्रुतिः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
पशव्यश्चैव पुण्यश्च सुस्थिरो धनधान्यवान् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ताः प्रदानाय़ोपकल्पिताः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पशुदा वित्तदा चैव सुखदा च महाय़शाः |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
पशुधर्मिषु पापेषु म्लेच्छेषु प्रभविष्यसि ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
पशुपतिवचनाद्भवामि सद्यः; कृमिरथ वा तरुरप्यनेकशाखः |
९५ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
पशुपाश्च कुणिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
जाजलिरु उवाच
पशुभिश्चौषधीभिश्च मर्त्या जीवन्ति वाणिज ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
पशुलुव्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
पशुवच्चैव तान्पृष्ठे वाहय़ामास वीर्यवान् ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
पशुवद्घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
पशुवन्मारय़ेय़ुर्वा क्षत्रिय़ा ये स्युरीदृशाः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
पशुय़ज्ञैः कथं हिंस्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
पशूंश्च ये वन्धय़न्ति ये चैव गुरुतल्पगाः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
पशूंश्चैव तथा मेध्यान्यज्ञार्थानि हवींषि च ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
पशूनवेक्षमाणाश्च साधुवृत्तेन दम्पती ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
पशूनां पतय़े चैव भूतानां पतय़े तथा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
पशूनां पतय़े नित्यमुग्राय़ च कपर्दिने ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
पशूनां वध्यतां चापि नान्तस्तत्र स्म दृश्यते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
पशूनां वृषणं छित्त्वा ततो भिन्दन्ति नस्तकान् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
पशूनामधिपञ्चाशद्धिरण्यस्य तथैव च |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ||
५१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
पशूनामिव का प्रीतिर्जीविते भरतर्षभ ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
धृतराष्ट्र उवाच
पशून्वासांसि रत्नानि धनानि विविधानि च |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
९
विराट उवाच
पशून्सपालान्भवते ददाम्यहं; त्वदाश्रय़ा मे पशवो भवन्त्विह ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
पश्चाच्च पीतवान्सोमं स राजन्केतनक्षमः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
पश्चात्कामं निषेवेत न च गच्छेत्प्रसङ्गिताम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
व्राह्मण उवाच
पश्चात्कार्यं वदिष्यामि श्रोतुमर्हति मे भवान् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
पश्चात्तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं; न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पश्चात्तापकरं कर्म न किञ्चिदुपपद्यते ||
७१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चात्तापमिदं प्राप्तं न त्वं शोचितुमर्हसि ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चात्तापाभिसन्तप्तो विदुरस्मारकर्शितः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
पश्चात्तापेन महता तप्यमानोऽभ्यचिन्तय़त् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चात्तु कुन्ती प्रसमीक्ष्य कन्यां; कष्टं मय़ा भाषितमित्युवाच ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
पश्चात्तु शैलवत्पेतुस्ते गजाः सह सादिभिः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
पश्चात्त्विमां पिता प्रादाद्भृगवेऽनृतकारिणे ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
पश्चात्संसाधय़त्यर्थं पुरस्तात्प्रतिषेधति ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
पश्चात्संसाधय़त्यर्थं पुरस्तात्प्रतिषेधते ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पश्चादङ्गुलय़ो रूक्षा विरूपा भैरवस्वनाः |
१२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
पश्चादनुमतस्तेन पप्रच्छ वसुमानिदम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापो भविष्यति |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चादस्याभवद्राजन्नात्मनः साध्वसं महत् |
२१ क