chevron_left  पश्यत्यकलुषंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
पश्यत्यकलुषं प्राज्ञः स मोहं नानुवर्तते ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
पश्यत्यकृतवुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २०८
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्यत्यर्चिष्मती भाभिर्हविर्भिश्च हविष्मती |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यत्येनं जाय़मानं व्रह्मा लोकपितामहः |
७२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
पश्यध्वं च महात्मानं कर्णं वैकर्तनं युधि |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
पश्यध्वं त्रिदशाः सर्वे उपमन्योर्महात्मनः |
१७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
पश्यध्वं मे दृढौ वाहू नागराजकरोपमा |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
पश्यध्वं यावदद्यैतान्पातय़ामि महीतले ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४२
हिडिम्वो उवाच
पश्यध्वं युधि विक्रान्तावेतौ तौ नरराक्षसौ ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ३४
उत्तर उवाच
पश्यध्वं सारथिं क्षिप्रं मम युक्तं प्रय़ास्यतः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यध्वमाय़तौ वृत्तौ भुजौ मे परिघाविव |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तः पादपांश्चापि फलभारावनामितान् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तः शान्तरजसः क्षपा जलदशीतलाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र शस्त्रपाणिं स्म मेनिरे ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
पश्यन्तः स्मय़मानाश्च सौभद्रस्य विचेष्टितम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तश्चारुरूपाणि रेमिरे तत्र पाण्डवाः ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तस्ते कुरुक्षेत्रं यय़ुराशु महारथाः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तस्ते मनोरम्यान्गन्धमादनसानुषु ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
पश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्ति न हि दुर्वृत्तैः शक्यो द्रष्टुं महेश्वरः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
पश्यन्ति नूनं पितरः पूजिताञ्शक्रसंसदि |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्ति पुरुषे दीप्तां सा समर्था भवत्युत ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
पश्यन्ति यद्व्रह्मविदो मनुष्या; स्तदक्षरं न क्षरतीति विद्धि ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
पश्यन्ति योगाः साङ्ख्याश्च स्वशास्त्रकृतलक्षणाः |
९८ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्ति हि भवन्तोऽद्य मय़्यतीव व्यतिक्रमम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
पश्यन्ती भवते दृष्टी रसती रसनं भवेत् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
पश्यन्तीनां ततस्तासां तत्रैवान्तरधीय़त ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तु तपसो वीर्यमद्य मे चिरसम्भृतम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
पश्यन्तु योगवीर्यं मे सर्वे देवाः सहर्षिभिः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
पश्यन्तु सर्वभूतानि दारुणं लोमहर्षणम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
पश्यन्तो दारुणं कर्म सततं क्षत्रिय़े स्थितम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तो दृढधन्वानः परिपूर्णां सरस्वतीम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तो मृगजातानि वहूनि विविधानि च ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्तो रमणीय़ानि वनानि च सरांसि च |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्त्या निहतं पुत्रं पुत्रेण सहितं रणे ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
पश्यन्त्येवंविधाः सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्त्वसुखितां कृष्णां सा च निर्विद्यतां पुनः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
पश्यन्नपश्यन्निव तत्समतिक्रामदच्युतः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
पश्यन्नपि जय़ं तेषां न निय़च्छामि यत्सुतान् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
पश्यन्नपि यथा लक्ष्म जगत्सोमे न विन्दति |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
पश्यन्निदं महाप्राज्ञः क्षत्ता राजानमुक्तवान् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
पश्यन्नुत्फुल्लनय़नः प्रवेष्टुमुपचक्रमे ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
पश्यन्प्रह्राद भूतानामुत्पत्तिमनिमित्ततः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
पश्यन्प्रह्राद संय़ोगान्विप्रय़ोगपराय़णान् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
पश्यन्भूय़िष्ठशो लोके को मोक्षं नाभिपूजय़ेत् ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्वहुपशून्ग्रामान्रम्यान्हृदय़तोषणान् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
पश्यन्वा पुत्रगृद्धित्वान्मन्दस्यान्वेति शासनम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यन्सुरमणीय़ानि पुष्पितानि वनानि च ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
पश्यमानस्तदात्मानमसमं मातरिश्वनः ||
१३ ख