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आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिग्रहाय़ पाण्डूनां प्रेषय़ामास कौरवान् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिग्रहाय़ाभिननर्द शल्यः; सम्यग्घुतामग्निरिवाज्यधाराम् ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४२
जरत्कारुरु उवाच
प्रतिग्रहीता तामस्मि न भरेय़ं च यामहम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
प्रतिग्रहीता दानस्य मोघं स्याद्धनिनां धनम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
विराट उवाच
प्रतिग्रहीतुं नेमां त्वं मय़ा दत्तामिहेच्छसि ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
जरत्कारुरु उवाच
प्रतिग्रहीष्ये भिक्षां तु यदि कश्चित्प्रदास्यति ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
जमदग्निरु उवाच
प्रतिग्रहे संय़मो वै तपो धारय़ते ध्रुवम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणां शाम्यतेऽनघ |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
प्रतिग्रहो याजनं च तथैवाध्यापनं नृप |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
प्रतिग्राह्यो मतो मे त्वं सदैव पुरुषर्षभ |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
प्रतिघातं तु सैन्यस्य नामृष्यत वृकोदरः |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिघातं ह्यविज्ञातं प्रवदन्ति मनीषिणः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
प्रतिघातार्थमस्त्रं वै स्थूणाकर्णमवासृजत् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
प्रतिघाताय़ कार्यस्य दिष्ट्या च यततेऽग्रतः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिघातेन सान्त्वस्य दारुणं सम्प्रवर्तते |
७० क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिघ्नतीव प्रभय़ा प्रभामर्कस्य भास्वराम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
प्रतिचक्रे च तं राजन्पाण्डवोऽप्यपसव्यतः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
प्रतिच्छन्नो वसत्यप्सु चेष्टमान इवोरगः ||
४३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
प्रतिजग्मतुरन्योन्यं क्रुद्धाविव गजोत्तमौ ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
प्रतिजग्मतुरभ्यर्च्य देवराजं महाद्युतिम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
भीष्म उवाच
प्रतिजग्मुः पुरीं रम्यां वत्सानामकुतोभय़ाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय़ तान्यथ ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्मुर्यथाकामं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञय़ा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्मुस्ततो राजन्यत्र दुर्योधनो नृपः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
प्रतिजग्राह चाग्निस्तां राजपुत्रीं सुदर्शनाम् |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तं पार्थो ग्लहं जग्राह सौवलः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तं भीष्मो गुरुं पाण्डुसुतैः सह |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तं राधा विधिवद्दिव्यरूपिणम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तच्चापि प्रीतिमानर्जुनस्तदा ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तत्कृष्णः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तत्पार्थो विधिवत्कुरुनन्दनः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तत्सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणय़ं चापि केशिहा |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्षिस्तपतीं तदा ||
५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह तां कृष्णः पीनेनांसेन वीर्यवान् ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमव्रवीत् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह तान्कर्णः शरानग्निशिखोपमान् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह ते पुत्रः शरवर्षेण वारय़न् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह तेजस्वी वाणैर्वाणान्विशातय़न् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
प्रतिजग्राह भावेन भावमस्या नृपोत्तमः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह मिथ्या मे न स्कन्देद्रेत इत्युत |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह राजेन्द्र तोय़वृष्टिमिवाचलः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिजग्राह रामस्तं स्वागतेन महामनाः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह विधिवद्धनैश्च समतर्पय़त् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह वेगेन कृतवर्मा महारथः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिजग्राह सत्कारैर्यथाविधि यथोपगम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिजग्राह समरे भीमसेनो हसन्निव ||
३१ ख