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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
पश्येथाश्च ततो योधान्सदा त्वं परिहर्षय़न् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
पश्येदमुग्रं नरवाजिनागै; राय़ोधनं वीरहतैः प्रपन्नम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
पश्येदुपाय़ान्विविधैः क्रिय़ापथै; र्न चानुपाय़ेन मतिं निवेशय़ेत् |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
पश्येमां धार्तराष्ट्रेण माय़ामप्सु प्रय़ोजिताम् |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
कृप उवाच
पश्येमां सह वीरेण जाम्वूनदविभूषिताम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
पश्येमानरिनिर्दारान्संसक्तानिव गच्छतः |
३५ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्येमान्पुरुषव्याघ्रान्संशान्तान्पावकानिव ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
तुलाधार उवाच
पश्येमान्हस्तपादेषु श्लिष्टान्देहे च सर्वशः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
पश्येमे रोदसी कृष्ण यय़ोरासन्निमाः प्रजाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
पश्येरन्नेकमतय़ो न सम्यक्तेषु दर्शनम् |
४७ क
विराट पर्व
अध्याय ६
विराट उवाच
पश्येस्त्वमन्तश्च वहिश्च सर्वदा; कृतं च ते द्वारमपावृतं मय़ा ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
मरुत्त उवाच
पश्येय़ं क्व नु संवर्तं शंस मे वदतां वर ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
पश्येय़ं च सतां लोकाञ्छुचीन्व्रह्मपुरस्कृतान् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
पश्येय़ं तमहं प्राज्ञं तुलाधारं यशस्विनम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३४
उत्तर उवाच
पश्येय़ुरद्य मे वीर्यं कुरवस्ते समागताः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यैकपद्यो दृश्यन्ते क्षेत्राणि विविधानि च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
पश्यैकादश मे रुद्रान्दक्षिणं पार्श्वमास्थितान् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यैतदन्तरं वाह्वोर्महापरिघय़ोरिव |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
पश्यैतद्धार्तराष्ट्राणामनीकं सुदुरासदम् ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
पश्यैतां द्रवतीं सेनां कर्णसाय़कपीडिताम् |
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यैताः पुण्डरीकाक्ष स्नुषा मे निहतेश्वराः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
पश्यैतान्देवकीमातर्मुमूर्षूनद्य संय़ुगे |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
पश्यैतान्पार्थिवाञ्शूरान्निहतान्भैमसेनिना |
१० क
वन पर्व
अध्याय १०
सुरभिरु उवाच
पश्यैनं कर्षकं रौद्रं दुर्वलं मम पुत्रकम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
पश्यैनं त्वं महाभागं ज्वलन्तमिव तेजसा ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यैनमेहि पाञ्चालि कामुकोऽय़ं यथा कृतः ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
पश्योदकपतेः स्थानं सर्वतोभद्रमृद्धिमत् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
पस्पर्ध कृष्णेन नृपः सदा यो; वृकोदरस्यैष परिग्रहोऽग्र्यः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
पस्पर्ध गङ्गा गन्धर्वान्पुलिनैश्च शिलोच्चय़ान् ||
५७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
पस्पर्श गात्रैः प्ररुदन्सुगात्रा; नाश्वास्य कल्याणमुवाच चैनान् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्त्वय़न् ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पस्पर्श सर्वगात्रेषु सौहार्दात्तं शनैस्तदा ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद्भरतसत्तम ||
५२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
पस्पृशुश्च करैर्गात्रं वीजमानाश्च यत्नतः |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
पह्लवान्दरदान्सर्वान्किरातान्यवनाञ्शकान् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
पह्लवान्वर्वरांश्चैव तान्सर्वाननय़द्वशम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
पांशुराष्ट्राद्वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद्वाय़ुना समुदीरिताः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वाय़ुना समुदीरिताः |
१७४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
पांसुग्रस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनिः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रय़ः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
पांसुभस्मकरीषाणां यथा वै राशय़श्चिताः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
पांसुभिः प्रत्यपिहितं पुरुषैस्तैरलक्षितम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
पांसुभिः समवच्छन्नः शून्यागारप्रतिश्रय़ः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
पांसुराष्ट्राधिप इति विश्रुतः सोऽभवन्नृपः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
पांसुराष्ट्राधिपश्चैव धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
पांसुरूषितगात्रेण महात्मा परुषीकृतः ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
पांसुवाताग्निसलिलैर्भस्मलोष्ठतृणद्रुमैः ||
५५ ख