शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाला भृशसंहृष्टा विनेदुः सिंहसङ्घवत् ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः |
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाला वृष्णय़ः सर्वे ये चान्येऽपि महाजनाः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाला हि जिघांसन्तो द्रोणं संहृष्टचेतसः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालांश्च महेष्वासान्पातय़ामास साय़कैः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालांश्च विदेहांश्च कुणिन्दान्काशिकोसलान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालांश्चैव तान्सर्वान्वाणैः संनतपर्वभिः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालांश्चैव सहितौ जघ्नतुः साय़कैर्भृशम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः कुरवश्चैव योधय़न्तः परस्परम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालाः कुरुभिः सार्धं किमकुर्वत सञ्जय़ ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याः पाण्डवाश्च विशेषतः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याः प्रतिनन्दन्ति पाण्डवम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याः समकम्पन्त भारत ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याः सृञ्जय़ाश्च विशां पते |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याः सृञ्जय़ाश्चोद्यताय़ुधाः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्याश्चेदिकारूषकोसलाः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
भीम उवाच
पाञ्चालाः केकय़ा मत्स्यास्तथा सर्वे प्रभद्रकाः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः केकय़ाश्चैव सिंहनादमथानदन् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः कौशिजाश्चैव एकपृष्ठा युगन्धराः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः पाण्डवाश्चैव युधिष्ठिरपुरोगमाः ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः पाण्डवाश्चैव सिंहनादान्विनेदिरे ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः पाण्डवेय़ाश्च तेऽन्योन्यस्य तलान्ददुः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः पाण्डवेय़ाश्च धर्मराजपुरोगमाः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः पाण्डवैः सार्धं पृष्ठतोऽनुय़युः परान् ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः पाण्डवैः सार्धं सर्व एवाभ्यवारय़न् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः प्रतिनन्दन्ति तेजोराशिमिवोद्यतम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः समकम्पन्त द्रोणसाय़कपीडिताः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः समकम्पन्त धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ||
३६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
पाञ्चालाः सहसा गुप्ता माय़ाश्च वहुशः कृताः ||
६२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालाः सुभृशं क्षीणाः कन्यामात्रावशेषिताः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः सृञ्जय़ाश्चैव निहते कुरुनन्दने ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः सृञ्जय़ाश्चैव वाजिनः परमद्विपाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः सृञ्जय़ाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाः सोमकाश्चैव परिवव्रुः समन्ततः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानथ मत्स्यांश्च केकय़ांश्च प्रभद्रकान् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानवधीत्कर्णस्त्रिगर्तांश्च धनञ्जय़ः |
७४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानवधीत्पञ्च कर्णो वैकर्तनो वृषः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानहनच्छूरश्चेदीनां च महारथान् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां कुरूणां च घोरो देवासुरोपमः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां कुरूणां च द्रोणे द्यूतमवर्तत ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालानां कुरूणां च विनाशं मधुसूदन |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां कुरूणां च व्यूहस्य पुरतोऽद्भुतम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालानां कुरूणां च हता एव हि येऽहताः |
२० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालानां च नाशेन कुरूणां पतनेन च ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च ये शिष्टा द्रौपदेय़ाश्च भारत |
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च वार्ष्णेय़ समुद्रान्तां विचिन्वताम् |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च संसक्तं न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च सर्वेषां चेदीनां चैव भारत ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च सर्वेषां भारतानां च दारुणम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां च सैन्यानि शरैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
५७ ग