द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्त्वेकतो द्रोणमभ्यघ्नन्पाण्डवान्यतः ||
३८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्त्वेकतो द्रोणमभ्यघ्नन्वहुभिः शरैः |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालिकार्थं सूक्ष्माणि चित्राणि विविधानि च |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाली च परिश्रान्ता पृष्ठेनोढा महात्मना ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
पाञ्चाली परुषाण्युक्ता को नु तत्क्षन्तुमर्हति ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चाली पाण्डवानेतान्दैवसृष्टोपसर्पति ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
कर्ण उवाच
पाञ्चाली पाण्डुपुत्राणां नौरेषा पारगाभवत् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चाली पुण्डरीकाक्षमासीनं यादवैः सह |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चाली भवतामेका धर्मपत्नी यशस्विनी |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चाली सुखमासाद्य लेभे चेतः शनैः शनैः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चाली सुषुवे वीरानादित्यानदितिर्यथा ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालीं चाहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालीमपकर्षद्भिः सभामध्ये तपस्विनीम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालीसहिता राजन्प्रय़युर्गन्धमादनम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
पाञ्चालेन क्रमः प्राप्तस्तस्माद्भूतात्सनातनात् |
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
पाञ्चालेन क्रमः प्राप्तो रामेण पथि देशिते ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालेषु च कौरव्य कथय़न्त्युत्पलावतम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु च क्षीणेषु वध्यमानेषु पाण्डुषु ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु च वीरेषु हतः केनास्यनाथवत् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु च शूरेषु वध्यमानेषु साय़कैः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालेषु च सर्वेषु कश्चिदन्योऽभ्यवर्तत ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु चरिष्यामि सूदय़न्नद्य संय़ुगे |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु तथा कर्णः क्षय़ं चक्रूर्महारथाः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालेषु प्रभग्नेषु दीर्यमाणेषु सर्वशः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालेषु महावाहुरुत्तरेषु नरेश्वरः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालेषूत्तमं शूरमुत्तमाभिजनप्रिय़म् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालेष्वद्भुताकारं याज्ञसेन्याः स्वय़ंवरम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालैः पाण्डवेय़ैश्च दिवसं क्षतविक्षताः ||
६८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालैः पाण्डवैर्मत्स्यैः कारूषैश्चेदिकेकय़ैः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालैः सह योत्स्यामि सोमकैः केकय़ैस्तथा |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
पाञ्चालैः सहितः सर्वैः सेनाग्रमभिकर्षति ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालैः सृञ्जय़ैश्चैव केकय़ैश्चोद्यताय़ुधैः ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालैर्मत्स्यकैकेय़ैः पाण्डवैश्च महारथैः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालैर्मानसादेत्य हंसैर्गङ्गेव वेगितैः ||
६४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चालैर्वा विनिहतौ कच्चिन्नास्वपतां क्षितौ |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं गोपतेः पुत्रं सिंहसेनमुदावहन् ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं चापि सवलं हत्वा शीघ्रं निवर्तत ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
पाञ्चाल्यं तु महावाहो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं त्रिभिरानर्छत्सात्यकिं निशितैः शरैः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं त्वरिताविध्यन्सर्व एव महारथाः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं पञ्चविंशत्या प्रहस्य पुरुषर्षभ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं विरथं भीमो हतसर्वाय़ुधं वशी |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यं शय़ने द्रौणिरपश्यत्सुप्तमन्तिकात् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यः परमास्त्रज्ञः शोणाश्वं समय़ोधय़त् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चाल्यः समरे क्रुद्धो धर्मात्मानं यतव्रतम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यः सात्यकिश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चाल्यपि च पञ्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यपुत्रं त्वरिताः परिवव्रुर्जिघांसय़ा ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
पाञ्चाल्यप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारय़त् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यमभिसन्त्यज्य द्रोणोऽपि रथिनां वरः |
३९ क