भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यश्च महेष्वासो द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्यस्तु ततः क्रुद्धः सैन्येन महता वृतः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
पाञ्चाल्यस्य द्रुपदस्यात्मजामिमां; सभामध्ये योऽतिदेवीद्ग्लहेषु ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्याय़ाभिसङ्क्रुद्धमन्तकाय़ान्तकोपमम् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
पाञ्चाल्येन रणे दृष्ट्वा द्रोणमावारितं शरैः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चाल्यौ च महेष्वासौ युधामन्यूत्तमौजसौ ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
पाटलान्कुटजान्रम्यान्मन्दारेन्दीवरांस्तथा ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
पाट्यमानाश्च दृश्यन्ते विवशा मांसगृद्धिनः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
पाट्यमानेषु कुम्भेषु पार्श्वेष्वपि च वारणाः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
पाठय़न्ति च विप्रेभ्यो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
पाणावाधाय़ वा शेफं प्रव्रजेदूर्ध्वदर्शनः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य निःश्वसन्निदमव्रवीत् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पाणिं मूर्ध्नि समाधाय़ स्पृष्ट्वा चाग्निं समाहितः |
९४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
पाणिकर्णाः सहस्राक्षास्तथैव च शतोदराः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिकूर्मा च शम्वूकः पञ्चवक्त्रश्च शिक्षकः |
७१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पय़ित्वा च देवताः |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
पाणिग्रहणकाले तु स्त्रीणामेतत्कथं स्मृतम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात्सप्तमे पदे |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
पाणिग्रहणमन्त्राणां प्रय़ोगादेव वानरम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
पाणिग्रहीता चान्यः स्यादत्र नो धर्मसंशय़ः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
युधिष्ठिर उवाच
पाणिग्रहीता त्वन्यः स्यात्कस्य कन्या पितामह |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
पाणिग्राहश्च धर्मेण सर्वे ते पतिताः स्मृताः ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
पाणिग्राहस्य तनय़ इति वेदेषु निश्चितम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
पाणिग्राहस्य भार्या स्याद्यस्य चाद्भिः प्रदीय़ते ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
पाणितालसतालैश्च शम्यातालैः समैस्तथा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
पाणिधर्मो नाहुषाय़ं न पुम्भिः सेवितः पुरा |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
पाणिना चैव सव्येन प्राहिणोदस्य दक्षिणम् ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पाणिना सह संश्लिष्ट एकीभूत इव प्रभो ||
१३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
पाणिपादं च पाय़ुश्च मेहनं पञ्चमं मुखम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
पाणिपादं समाधाय़ विनीतवदुपाविशत् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिपादशिरःपृष्ठवाहुशाखानिरन्तरम् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पाणिपादैश्च शस्त्रैश्च रथैश्च कदनं महत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिभिः परिमार्गन्तो भीता वाय़ोर्निलिल्यिरे ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
पाणिभिर्जलशीतैश्च जय़ाशीर्भिश्च कौरव ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मधुसूदन |
५४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मृदुपाणय़ः ||
४८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
पाणिभ्यां च परिस्प्रष्टुं प्राणा हि न जहुर्मम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिभ्यां प्रतिगृह्णातु धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
पाणिमद्भ्यः स्पृहास्माकं यथा तव धनस्य वै ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
पाणिमध्यगतं दृष्ट्वा भार्गवं तमुमापतिः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
पाणिमन्तो धनैर्युक्ता वलवन्तो न संशय़ः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिमालम्व्य राज्ञः स सस्वरं प्ररुरोद ह ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पाणिवन्धं स्वय़ं कृत्वा सहधर्ममुपेत्य च |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
पाणिस्पर्शेन राज्ञस्तु राजा सञ्ज्ञामवाप ह ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
पाणीनरत्नीनसकृद्भल्लैश्चिच्छेद पाण्डवः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पाणीन्पाणिगतं शस्त्रं वाहूनपि शिरांसि च ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
पाणौ कुण्डं तथा कुण्डे पय़ः पय़सि मक्षिकाः |
१७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
पाणौ गृहीता तत्रैव विसृज्या इति मे पिता |
३८ क