शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिपेदे महावाहुरर्जुनो राजशासनात् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिपेदे महावाहुर्मन्दरं मघवानिव ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिपेदे महावुद्धिर्वसिष्ठाच्च यतव्रतात् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
प्रतिपेदे यथान्याय़ं भक्त्या परमय़ा युतः ||
२४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिपेदे हृषीकेशः शार्ङ्गं च धनुरुत्तमम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिप्रकाशिते लोके दिवाभूते निशाकरे |
४७ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिप्रदानं शरणागतस्य; स्त्रिय़ा वधो व्राह्मणस्वापहारः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
प्रतिप्रभा रश्मिभिराजमीढ; पुनः पुनः सञ्जनय़न्ति दीप्ताः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
शिखण्ड्यु उवाच
प्रतिप्रय़ाते दाशार्णे पार्थिवे हेमवर्मणि |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिप्रय़ान्त्वद्य दशार्हवीरा; दृढोऽस्मि नाथैर्नरलोकनाथैः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिभा त्वस्ति मे काचित्तां व्रूय़ामनुमानतः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिभाति विदीर्णेव सर्वतो भारती चमूः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिभान्ति महावाहो सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
यवक्रीरु उवाच
प्रतिभान्त्विति तप्येऽहमिदं परमकं तपः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
प्रतिभामुपसर्गांश्चाप्युपसङ्गृह्य योगतः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
प्रतिभासि महावाहो विभीश्चैव धनञ्जय़ात् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
प्रतिभास्यति योगश्च येन युक्तो दिवौकसाम् |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
प्रतिभास्यन्ति ते वेदाः पित्रा सह यथेप्सिताः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३६
यवक्रीरु उवाच
प्रतिभास्यन्ति वै वेदा मम तातस्य चोभय़ोः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
प्रतिभास्यन्ति वै वेदास्तव चैव पितुश्च ते ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
प्रतिभोगसुखेनैव कोशमस्य विरेचय़ ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिमानेषु कुम्भेषु दन्तवेष्टेषु चापरे |
५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिमानैश्च कुम्भैश्च पेतुरुर्व्यां महाहवे ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
प्रतिमाश्चालिखन्त्यन्ये सशस्त्राः कालचोदिताः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिमुञ्चन्तु गात्रेषु दीय़न्तामाय़ुधानि च ||
२० ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
प्रतिरव्धस्ततः कर्णो रोषात्प्रस्फुरिताधरः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
प्रतिरव्धाश्च भूय़िष्ठं ये शिष्टास्तत्र सैनिकाः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिरव्धास्तु वाह्लीका न च केचन मद्रकाः |
८१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
प्रतिरुद्धास्तथैवाहं समरे दंशितः स्थितः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
प्रतिरूपं जनाः कुर्युर्न च तद्वर्तते तथा ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
प्रतिरूपं यथैवाप्सु तापः सूर्यस्य लक्ष्यते |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
प्रतिरूपधराः केचिद्दृश्यन्ते वुद्धिसत्तमाः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतिलभ्य च सा सञ्ज्ञां देवी दिव्यवपुर्धरा |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
प्रतिलभ्य च सा सञ्ज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
जनमेजय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः कृष्णां किमकुर्वत पाण्डवाः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां क्रोधेन द्विगुणीकृतः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां नकुलः पाण्डुनन्दनः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां पुत्रस्तव विशां पते |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां भीमसेनो महावलः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां भीमसेनो महावलः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां मारुतिः क्रोधमूर्छितः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां मुहूर्ताद्द्विजसत्तमः |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां योधास्ते कुरुसत्तम |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां वासविः क्रोधमूर्छितः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां श्वेताश्वः कृष्णसारथिः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञां सहदेवो विशां पते |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञामभिवाद्य कृताञ्जलिः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
प्रतिलभ्य ततः सञ्ज्ञामश्वत्थामा महावलः |
३३ क