उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवांश्चैव मत्स्यांश्च पाञ्चालान्केकय़ैः सह |
२५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
पाण्डवाः किमकुर्वन्त तथा कृष्णे दिवं गते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
जनमेजय़ उवाच
पाण्डवाः किमकुर्वन्त तमृते सव्यसाचिनम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः कुरवश्चैव पालय़न्तु वसुन्धराम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
पाण्डवाः केकय़ा मत्स्याः पाञ्चालाश्च विशेषतः |
१०१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः कौरवाश्चैव समासाद्य परस्परम् |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
पाण्डवाः पञ्च दुःखार्ता भूतानीव युगक्षय़े ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः प्रत्यदृश्यन्त ज्वलिता इव पावकाः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः प्रीतमनसः सामात्याः ससुहृद्गणाः ||
४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः शोकसन्तप्ता वित्रस्तमनसोऽभवन् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः समदृश्यन्त नर्दन्तो वृषभा इव ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः समरे शूराः स्थिता युद्धाय़ मारिष ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः समवर्तन्त वज्रपाणिमिवासुराः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः समवोध्यन्त वाल्यात्प्रभृति केशव ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः सर्वकार्याणि सम्पृच्छन्ति स्म तं नृपम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
नारद उवाच
पाण्डवाः सह कृष्णेन वाग्भिरुग्राभिरार्दय़न् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सह पाञ्चालैः पुनरेवाभ्यवारय़न् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सह पाञ्चालैर्योधाश्चान्ये नृपोत्तमाः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाः सह भीष्मेण कथाश्चक्रुस्तदाश्रय़ाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सहपञ्चालाः शार्दूलं वृषभा इव ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डवाः सृञ्जय़ाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय़ ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सृञ्जय़ाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ||
१०१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सृञ्जय़ैः सार्धं कुरवश्च यथाविधि ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सोमकाश्चैव ये चैषामनुय़ाय़िनः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवाः सोमकैः सार्धं ततो युद्धमवर्तत ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डवाग्निमनावार्यं मुमूर्षुर्मूढचेतनः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
पाण्डवाग्निमहं दीप्तं प्रदहन्तमिवाहितान् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानग्निना दग्धानमात्यं च पुरोचनम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानथ तान्सर्वाञ्शल्यस्तत्र ददर्श ह ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानधिकाञ्जानन्वले शौर्ये च कौरव ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानभ्यनुज्ञाय़ विदुरः प्रय़यौ गृहान् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानभ्यवर्तन्त तस्मिन्वीरवरक्षय़े ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानभ्यवर्तन्त पाण्डवाश्च दिवौकसः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानभ्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानभ्यवर्तन्त विविधाय़ुधपाणय़ः |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छ्रितध्वजाः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च गर्जतामितरेतरम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च घोरं रुधिरकर्दमम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च द्रोणपाञ्चाल्ययोरपि ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च परस्परसमागमे |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च पुरस्कृत्य घटोत्कचम् ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च भवान्परमकः सुहृत् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च यमराष्ट्रविवर्धनः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च युद्धं लोकभय़ङ्करम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च राज्ञां चामिततेजसाम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च समरे विजय़ैषिणाम् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
पाण्डवानां कुरूणां च सर्वेषां च महीक्षिताम् ||
११ ग