शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
पञ्चैतानि पवित्राणि षष्ठं सुचरितं तपः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
पञ्चैतानि महावाहो कारणानि निवोध मे |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
पञ्चैतान्यर्थजातानि वाक्यमित्युच्यते नृप ||
७९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चैतान्वाहिनी पुत्रान्व्यजाय़त मनस्विनी ||
४४ ग
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चैते जज्ञिरे राजन्वीर्यवन्तो महासुराः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
पञ्चैव गुरवो व्रह्मन्पुरुषस्य वुभूषतः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
पञ्चैव तानि कालश्च भावाभावौ च केवलौ |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
पञ्चैव पूजय़ँल्लोके यशः प्राप्नोति केवलम् |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चैव वर्षाणि तदा व्यतीय़ु; रधीय़तां जपतां जुह्वतां च ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
पञ्चैव हि सुता मातर्भविष्यन्ति हि ते ध्रुवम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
पञ्चोपधाव्यतीतांश्च कुर्याद्राजार्थकारिणः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
पञ्चय़ज्ञप्रवृत्तेन गृहस्थेन विशेषतः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
पञ्चय़ज्ञविशुद्धात्मा सत्यवागनसूय़कः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
पञ्चय़ज्ञांस्तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमी |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्चय़ोजनमुत्सृज्य मण्डलं तद्रणाजिरम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
पञ्चय़ोजनविस्तारमाय़तं शतय़ोजनम् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
पञ्जरान्तरसञ्चारी शकुन्त इव भारत ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
पटच्चरैश्च हुण्डैश्च राजन्पौरवकैस्तथा |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पटहाञ्झर्झरांश्चैव कृकचान्गोविषाणिकान् |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
पटुघण्टारवशतां वासवीमशनीमिव |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
पटेनाग्निं प्रज्वलितं यथा वाला यथा जडाः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
पट्टिशं च त्रिभिर्वाणैश्चिच्छेद तिलकाण्डवत् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
पट्टिशं त्वन्वगाद्राजंश्छत्रं रौद्रं महाप्रभम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
पट्टिशाश्च भुशुण्ड्यश्च प्रापतन्ननिशं मय़ि ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
पट्टिशासिधराः शूरा वभूवुरनिवर्तिनः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
पट्टिशैः करवालैश्च रथचक्रैश्च भारत ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः ||
२२ ग
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
पट्टिशैः परिघैः शूलैर्गदाभिश्च सवासवाः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
पट्टिशैश्च सनिस्त्रिंशैर्नानाप्रहरणैस्तथा ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
पट्टिसं मुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम् |
८१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पट्टैर्जाम्वूनदैर्वद्धा वभूव जनहर्षिणी |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
पठन्ति चैव मुनय़ः शास्त्रेषु विविधेषु च |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पठन्ति पाणिस्वनिका मागधा मधुपर्किकाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
पठन्ति पाणिस्वनिकास्तथा गाय़न्ति गाय़नाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
पठन्ति ये विप्रसदः समागमे; समृद्धकामाः श्रिय़माप्नुवन्ति ते ||
९३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
जनमेजय़ उवाच
पठन्ति विधिमास्थाय़ ये चापि यतिधर्मिणः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
पठन्नरः स्याद्विजितेन्द्रिय़ो वशी; सपुत्रपौत्रः शतवर्षभाग्भवेत् ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
पठन्नाख्याय़िकां नाम स्त्रीभावेन पुनः पुनः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
पठन्वै शतरुद्रीय़ं शृण्वंश्च सततोत्थितः ||
१०४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
पठस्व पुत्र भद्रं ते प्रीय़तां ते महेश्वरः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
पठेत यो वै शृणुय़ाच्च नित्यदा; न विद्यते तस्य नरस्य किल्विषम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा; न वाङ्मय़ं स लभति किञ्चिदप्रिय़म् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेय़ः प्राप्तुं सुखानि च ||
१४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
पठ्यमानेषु मन्त्रेषु शान्त्यर्थं परमर्षिभिः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२३
विनतो उवाच
पणं वितथमास्थाय़ सर्पैरुपधिना कृतम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधां वर |
६४ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
पणस्व कृष्णां पाञ्चालीं तय़ात्मानं पुनर्जय़ ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
पणावः किं व्याहरसे जित्वा वै व्याहरिष्यसि ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
पणित्वा चैकपाणेन रोचय़ेदेवमाहवम् ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
पण्डितान्पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः |
३० क