वन पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशा मे सुतास्तव |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
पाण्डोः सुतैस्तद्व्रतमुग्ररूपं; वर्षाणि षट्सप्त च भारताग्र्यैः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोरर्थे परिक्रीता धनेन महता तदा |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोरवभृथं कृत्वा देवकल्पा महर्षय़ः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
पाण्डोरिति मय़ा पुत्र तस्मादुद्धर्षणं कृतम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरं चैव तापसाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोर्वनं तु सम्प्रेक्ष्य प्रजज्ञे हृदि मन्मथः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्डोर्विदुर सर्वाणि प्रेतकार्याणि कारय़ |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोश्च पिण्डो दाशार्ह तथैव श्वशुरस्य मे ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोस्तु जज्ञिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक् |
९६ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डोस्तु द्वे भार्ये वभूवतुः कुन्ती माद्री चेत्युभे स्त्रीरत्ने ||
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
पाण्ड्यराजो महावीर्यः पाण्डवानां धुरन्धरः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्ड्यश्च राजामित इन्द्रकल्पो; युधि प्रवीरैर्वहुभिः समेतः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
पाण्ड्यांश्च द्रविडांश्चैव सहितांश्चोड्रकेरलैः |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्ड्ये हते किमकरोदर्जुनो युधि सञ्जय़ |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पाण्ड्येनाभ्यर्दितां सेनां त्वदीय़ां वीक्ष्य धिष्ठितः ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
पाण्योश्च तद्वत्स्वनवन्निवद्धौ; कलापकावक्षमाला यथेय़म् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पातकान्यपि पूय़न्ते पितुर्वचनकारिणः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
पातनं शंस मे भूय़ः शल्यस्याथ सुतस्य मे ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
पातनः शत्रुसङ्घानां पपात धरणीतले ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
पातारोऽसृग्वसाद्यानां मांसान्त्रकृतभोजनाः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
पाताल इव मज्जन्तो हीना देवव्रतेन ते |
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
पातालज्वलनशिखाविदीपितं तं; पश्यन्त्यौ द्रुतमभिपेततुस्तदानीम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
पातालज्वलनावासमसुराणां च वन्धनम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
पातालतलवासीनि विलय़ं समुपानय़त् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
पातालतलसंस्थोऽपि यदि शक्रोऽस्य सारथिः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
पातालमगमत्सर्वो विषादभय़कम्पितः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
पातालमिति विख्यातं दैत्यदानवसेवितम् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
पातालमिव गम्भीरं सुहृदानन्दवर्धनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
पातालमिव दुष्पूरो मां दुःखैर्योक्तुमिच्छसि |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पातालवासिनो रौद्रा दनोः पुत्रा महावलाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
पातालवासिनो रौद्राः पूर्वं देवैर्विनिर्जिताः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पातितः समरे कर्णश्चक्रव्यग्रोऽग्रणीर्नृणाम् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पातिताः समदृश्यन्त तैश्चापि गजय़ोधिनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पातिते युधि दुर्धर्षे मद्रराजे महारथे |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
पातिते सारथौ तस्मिंस्तव पुत्ररथः प्रभो |
४१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
पातितो भीमसेनेन एकादशचमूपतिः ||
५७ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
पातितो भुवि भीमस्तु कीचकेन वलीय़सा |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
पातु त्वां वरुणो राजा सलिले सलिलेश्वरः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात्स शुश्रुवे ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पात्यमानस्त्वय़ा दृष्टो न चैनं त्वमवारय़ः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पात्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
पात्रं त्वतिथिमासाद्य शीलाढ्यं यो न पूजय़ेत् |
९२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
पात्रं प्रतिग्रहस्याय़ं दातुं पात्रं तथा भवान् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
उत्तङ्क उवाच
पात्रं प्रतिग्रहे चापि विद्धि मां नृपसत्तम ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
युधिष्ठिर उवाच
पात्रं विद्याम तत्त्वेन यस्मै दत्तं न सन्तपेत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
पात्रभूतैरलुव्धैश्च पाल्यमानं गुणीभवेत् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
पात्रीभूतश्च कौन्तेय़ो व्राह्मणो गुणवानिव |
७ क