विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन्भोजय़न्त्युत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन्भोजय़न्त्युत ||
४७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन्भोजय़न्त्युत |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
पात्रे दत्त्वा प्रिय़ाण्युक्त्वा सत्यमुक्त्वा च भारत |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
पात्रे दानं स्वल्पमपि काले दत्तं युधिष्ठिर |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
पात्रे देशे च काले च साधुभ्यः प्रतिपादय़ेत् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पातय़न्तोत्तमाङ्गानि पाण्डवा गजय़ोधिनाम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
पातय़न्निव वृक्षांस्तान्सुमहान्वातसम्भ्रमः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
पातय़न्नुत्तमाङ्गानि गन्धर्वाणां महारथः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
पातय़न्रथिनो राजन्गजांश्च सह सादिभिः |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
पातय़न्वै तरुगणान्विनिघ्नंश्चैव सैनिकान् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
पातय़ामास कौन्तेय़ः कथं तमजितं युधि ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास कौरव्यं रथोपस्थादरिन्दमः |
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास खड्गेन सध्वजानपि पाण्डवः ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास तान्सर्वान्दुष्टहस्तीव हस्तिनः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
पातय़ामास दुःषन्तो निर्विभेद च साय़कैः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
पातय़ामास नाराचैर्द्रुमेभ्य इव वर्हिणः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास भल्लेन कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा त्रिभिः शरैः ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास भीष्मस्य धनुश्छित्त्वा शितैः शरैः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
पातय़ामास वेगेन कुलिशं मघवानिव ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास सङ्क्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास समरे तस्मिन्नतिभय़ङ्करे ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास समरे दण्डहस्त इवान्तकः ||
३५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
पातय़ामास समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास समरे सहदेवो हसन्निव ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामास समरे सिंहनादं ननाद च |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामासतुर्वीरौ शिरांसि शतशो नृणाम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
पातय़ामासुरव्यग्राः पुत्रस्य तव मूर्धनि ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
पातय़ित्वा कृपस्याश्वांस्तथोभौ पार्ष्णिसारथी |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
पातय़ित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
पातय़ित्वा वय़स्यांश्च भ्रातॄनथ पितामहान् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
पातय़ित्वा हय़ान्सर्वांस्त्रिगर्तानां रथान्ययौ ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
पातय़िष्यति विक्रम्य शत्रुर्गच्छ नराधम ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पातय़िष्यामि दुर्धर्षं वृद्धं कुरुपितामहम् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
पातय़ेत्त्रिदिवाद्देवान्योऽर्जुनं समरे जय़ेत् ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
पातय़ेत्त्रिदिवाद्देवान्योऽर्जुनं समरे जय़ेत् ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
पातय़ेत्त्रिदिवाद्देवान्योऽर्जुनं समरे जय़ेत् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
पातय़ेय़महं त्वाद्य सवज्रमपि मुष्टिना ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
श्रीकृष्ण उवाच
पातय़ैनं रथात्पार्थ वज्राहतमिव द्रुमम् |
९१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
पादपांश्च महाकाय़ांश्चूर्णय़ामासतुस्तदा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
पादपानां च या माता करञ्जनिलय़ा हि सा |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पादपीठादपहृतौ तत्रापश्यमहं शुभौ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
पादपैः पुष्पविकचैः फलभारावनामितैः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
पादप्रक्षालनं कुर्यात्कुमार्याः संनिधौ मम ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पादप्रक्षालनं कुर्यात्स्वाध्याय़े भोजने तथा ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
पादप्रहारेण धरां प्रावेशय़दरिन्दमः ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
पादभागैस्त्रिभिर्वापि व्ययः संशोध्यते तव ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पादमानमय़न्पार्थः केशवं समचोदय़त् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
पादशुश्रूषणे युक्तः प्रिय़वाक्सर्वकामदः |
१० क