आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पादशुश्रूषणे युक्तो राज्ञो मात्रोस्तथानय़ोः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
पादशौचं तु कृत्वैव शुकः सन्ध्यामुपास्य च |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम् ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
पादाङ्गुलीरभिप्रेक्षन्प्रय़तोऽहं कृताञ्जलिः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
पादाच्चतुर्थात्सम्भूत आत्मा यस्मान्मुने तव |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
पादाता दन्तिनश्चैव चक्रुरार्तस्वरं महत् ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पादाता निहता भूमौ शिश्यिरे रुधिरोक्षिताः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
पादातांश्च सुसङ्क्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः |
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पादातानवमृद्नन्तो रथवारणवाजिनः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्च त्रिसाहस्रा द्रौपदेय़ाश्च सर्वशः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्च त्रिसाहस्राः शकुनिं सौवलं जहि ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्च पदात्योघैस्ताडिताः शक्तितोमरैः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्च रणे द्रोणं प्रापय़न्तु महारथम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
पादाताश्च हय़ाश्चैव पृष्ठतः समनुव्रजन् ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्चाग्रतोऽगच्छन्धनुश्चर्मासिपाणय़ः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्चापि शस्त्राणि समुत्सृज्य महारणे |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्चाप्यदृश्यन्त निघ्नन्तो हि परस्परम् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
पादाताश्चाप्यदृश्यन्त साश्वाः सहय़सादिनः ||
१२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
पादातास्त्वग्रतोऽगच्छन्नसिशक्त्यृष्टिपाणय़ः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
पादातैराहता नागा विवरेषु समन्ततः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
पादात्प्रभृतिगात्रेषु क्रमेण क्रमय़ोगवित् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पादापसारिणं धर्मं विद्वान्स तु युगे युगे |
७२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
पादाभिवन्दनं कृत्वा धर्मराजमते स्थिताः |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
पादावकृष्टो राजन्ये तथा धर्मो विधीय़ते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
पादावध्यात्ममित्याहुर्व्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
पादावध्यात्ममित्याहुर्व्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
पादावुपस्पृश्य शनैः प्रहसन्वाक्यमव्रवीत् ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
पादे तु दक्षिणे राजन्गौतमः सत्यविक्रमः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
पादेन शकटं भीष्म तत्र किं कृतमद्भुतम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
पादेन ह्रसते धर्मो रक्ततां याति चाच्युतः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
पादेनैकेन कौन्तेय़ धर्मः कलिय़ुगे स्थितः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
पादेषु च निगृह्यैनान्विनिहत्य वलाद्वली |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
पादैः सलिलपानं च व्याधीनामपि दर्शनम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
पादैरेवावमृद्नन्त मत्ताः कनकभूषणाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
पादोनेनापि धर्मेण गच्छेत्त्रेताय़ुगे तथा |
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
पादौ गृहीत्वा कुरुसत्तमस्य; भीष्मस्य मां तत्र निवेदय़ेथाः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
शक्र उवाच
पादौ च ते नासिकय़ोपजिघ्रते; श्रेय़ो मम ध्याहि नमश्च तेऽस्तु ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
पादौ च मे सरथौ सध्वजौ च; न मादृशं युद्धगतं जय़न्ति ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पादौ च मे सशरौ सहध्वजौ; न मादृशं युद्धगतं जय़न्ति ||
९५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पादौ जग्राह पाणिभ्यां भ्रातुर्ज्येष्ठस्य मारिष ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
पादौ जनन्याः प्रतिपूज्य चाहं; तथार्ष्टिषेणं रथमभ्यरोहम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
पादौ तव ग्रहीष्यन्ति भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
पादौ तव ग्रहीष्यन्ति सर्वे चान्धकवृष्णय़ः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
पादौ तव धरा देवी दिशो वाहुर्दिवं शिरः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
पादौ तस्य महीं विद्धि मूर्धानं दिवमेव च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्योषधय़स्तथा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
पादौ न धावय़े तावद्यावन्न निहतोऽर्जुनः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
पादौ पाय़ुरुपस्थं च हस्तौ वाग्दशमी भवेत् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
पादौ पाय़ुरुपस्थश्च हस्तौ वाक्कर्मणामपि ||
२८ ख