शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पादौ प्रक्षिप्य सा पूर्वं पावके चारुदर्शना |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य राज्ञश्चापि जनार्दनः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
पादौ यस्याश्रिताः शूद्रास्तस्मै वर्णात्मने नमः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
पादौ शूद्रा भजन्ते मे विक्रमेण क्रमेण च ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
पादौ सङ्गृह्य मानार्हौ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
भीष्म उवाच
पाद्यं निवेद्य प्रथममर्घ्यं गां च न्यवेदय़त् |
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५१
द्रौपद्यु उवाच
पाद्यं प्रतिगृहाणेदमासनं च नृपात्मज |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१११
ऋश्यशृङ्ग उवाच
पाद्यं वै ते सम्प्रदास्यामि कामा; द्यथाधर्मं फलमूलानि चैव ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
पाद्यमर्घ्यं च गां चैव प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
पाद्यमर्घ्यं यथान्याय़मासनं शय़नं तथा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
पाद्यमाचमनीय़ं च अर्घ्यं गां च विधानतः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
इन्द्र उवाच
पाद्यमाचमनीय़ं च गामर्घ्यं च प्रतीच्छ मे ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
पाद्यमाचमनीय़ं च ददौ भर्त्रे तथासनम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
पाद्यमाचमनीय़ं च प्रतिगृह्य द्विजोत्तमः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
पाद्यमाचमनीय़ं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
पाद्यमाचमनीय़ं च प्रतिवेद्यान्नमुत्तमम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
पाद्यमासनमेवाथ दीपमन्नं प्रतिश्रय़म् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
पाद्यादीनि प्रतिग्राह्य पूजय़ा परय़ार्च्य च |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पाद्यार्घ्यमधुपर्कैस्तं पूजार्हं प्रत्यपूजय़त् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
पाद्यार्घ्याचमनीय़ेन स्वागतेन च भारत |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
पाद्यार्घ्याचमनीय़ैस्तमर्चय़ामास भारत |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
पाद्यार्घ्याभ्यां यथान्याय़मुपतस्थुर्मनीषिणम् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
पाद्यार्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पवुद्धय़ः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
पाद्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पादय़ोः पतितं दृष्ट्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
पादय़ोः पतितं वीरं विक्लवं भ्रातृसौहृदात् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
पादय़ोः पातय़िष्यामि कौन्तेय़स्य महात्मनः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
पादय़ोर्न्यपतद्राजा स्वस्ति मेऽस्त्विति चाव्रवीत् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
पादय़ोश्चैव विप्राणां ये त्वन्नमुपभुञ्जते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
पादय़ोस्तु महाराज स्थितः श्रीमान्महारथः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पानपस्य च ये लोका गुरुदाररतस्य च ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
पानपैर्गुरुतल्पैश्च मांसादैर्वा दुरात्मभिः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
पानपो द्वेषणः क्रूरो निर्घृणः परुषस्तथा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
पानमक्षास्तथा नार्यो मृगय़ा गीतवादितम् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
सुदेष्णो उवाच
पानमानय़ कल्याणि पिपासा मां प्रवाधते ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
पानमानय़ मे क्षिप्रं पिपासा मेति चाव्रवीत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
पानागाराणि वेशाश्च वेशप्रापणिकास्तथा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
पानागारेषु वेशेषु तीर्थेषु च सभासु च ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
पानानि चाग्र्याणि ततो मुमोद; चिक्रीड चैव प्रजहास चैव ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
पानीय़ं नरशार्दूल तस्माद्दातव्यमेव हि ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
पानीय़ं पाय़सं सर्पिर्दधिसक्तुमधून्यपि |
९१ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
पानीय़ं भोजनं चैव याचमानास्तदाध्वगाः |
८० क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
पानीय़ं मृगय़ामीह विश्रमध्वमिति प्रभो ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
पानीय़ं यवसं चापि नाभिनन्दन्ति माधव ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
पानीय़ं याचितः पार्थः सोऽविध्यन्मेदिनीतलम् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
पानीय़ं वा निराय़ासं स्वाद्वन्नं वा भय़ोत्तरम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
पानीय़दाता च यमस्य लोके; न यातनां काञ्चिदुपैति तत्र ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
युधिष्ठिर उवाच
पानीय़दानं परमं कथं चेह महाफलम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
पानीय़दानं परमं दानानां मनुरव्रवीत् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
पानीय़दानात्प्रभृति सर्वं वक्ष्यामि तेऽनघ ||
३ ग