उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
प्रतीतो निवसाम्येष प्रतिज्ञामनुपालय़न् ||
१९ ग
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपं रोचय़ामास पितरं भूरिवर्चसम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपं वचनं मध्ये तव कृष्ण न रोचते ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
प्रतीपं ह्रिय़माणाश्च वारणा वरवारणैः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपः खलु शैव्यामुपय़ेमे सुनन्दां नाम |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
प्रतीपः पृथिवीपालस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपः शन्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपकारी युष्माकमिति चोपेक्षितो मय़ा ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
प्रतीपकाय़े तु रणादश्वत्थाम्नि हृते हय़ैः |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतीपमिव मे भाति युय़ुधानेन भारती |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतीपमुपधावद्भिः किं पुनस्तात पाण्डवैः ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
प्रतीपरक्षितं राष्ट्रं त्वां प्राप्य विनशिष्यति |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच मनस्विनीम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतीपस्य त्रय़ः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वसव ऊचुः
प्रतीपस्य सुतो राजा शन्तनुर्नाम धार्मिकः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
प्रतीपान्पततो मत्तान्कुञ्जरान्प्रतिगर्जतः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
प्रतीपय़ा जिह्वय़ापि सर्वाहारान्करिष्यथ |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
प्रतीय़ां नाहमाचार्यं त्वां न जह्यां कथञ्चन ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
प्रतीय़ू रथिनो नागान्नागाश्च रथिनो यय़ुः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
प्रतेरुर्वहवो राजन्भय़ं त्यक्त्वा महाहवे ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
प्रतोदं चास्य भल्लेन छित्त्वा भूमावपातय़त् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
प्रतोदः प्रापतद्धस्ताद्रश्मय़श्च विशां पते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
प्रतोदपाणिस्तेजस्वी सिंहवद्विनदन्मुहुः |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
प्रतोदानां कशानां च योक्त्राणां चैव मारिष |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रतोदेन जवोपेतान्परमाश्वानचोदय़त् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य कृतास्त्वय़ा |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
प्रतोदेनातुदद्वालां रुक्मिणीं मम पश्यतः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
सुरभिरु उवाच
प्रतोदेनाभिनिघ्नन्तं लाङ्गलेन निपीडितम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
प्रतोदेनाहता राजन्रश्मिभिश्च समुद्यताः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
प्रतोदैश्चापकोटीभिर्हुङ्कारैः साधुवाहितैः |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं कारणं दृष्टं हेतुकाः प्राज्ञमानिनः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
तुलाधार उवाच
प्रत्यक्षं क्रिय़तां साधु ततो ज्ञास्यसि तद्यथा ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
प्रत्यक्षं खल्विदानीं मे विश्वामित्रो यदुक्तवान् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं गुणवादी यः परोक्षं तु विनिन्दकः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं च तवाप्येतद्व्राह्मणेषु तपस्विषु |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
प्रत्यक्षं च परोक्षं च गुणवादी विचक्षणः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्टं तत्पौरुषमिति स्मृतम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
प्रत्यक्षं चैव ते कृष्ण पश्य सिद्धान्व्यवस्थितान् |
१९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यक्षं चैव ते सर्वं यथा वलमिदं तव |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षं तव गान्धारे ससैन्यस्य विशां पते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तन्मे कथय़तः शृणु ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र राजसूय़े यथाभवत् ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र वैरस्यास्य समुद्भवः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
प्रत्यक्षं तु किमत्रास्ति यद्भवन्त उपासते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
प्रत्यक्षं तु कुरुश्रेष्ठ त्यज लोभमिहात्मना |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षं ते न ते किञ्चित्परोक्षं शत्रुकर्शन ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
प्रत्यक्षं ते महाराज गणय़िष्ये विभीतकम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यक्षं ते महावाहो यथा पार्थेन धीमता |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यक्षं ते महावाहो यथासौ चरति द्विजः ||
८३ ग