आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत्तन्निवोध मे ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
पार्थं च निशितैर्वाणैरविध्यत्तनय़स्तव ||
४० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
पार्थं च वासुदेवं च चक्रगाण्डीवधारिणौ |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थं च स महावाहुर्महावेगैर्महारथः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
पार्थं सिषिचतुर्वाणैर्गिरिं मेघाविवोत्थितौ ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पार्थं ह्येते गताः सर्वे वीर्यज्ञास्तस्य धीमतः ||
१७ ग
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
पार्थः पञ्च च षष्टिं च वर्षाणि श्वेतवाहनः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थः पञ्चशताञ्शूरान्पार्वतीय़ान्महारथान् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
पार्थः पुत्रवधात्क्रुद्धः कौरवाञ्शोषय़िष्यति ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थः प्रस्थापय़ामास कृत्वा गोपालिकावपुः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थः प्राप्य धनुःश्रेष्ठमक्षय़्यौ च महेषुधी |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थः प्राप्य धनुःश्रेष्ठमक्षय़्यौ च महेषुधी |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पार्थः प्रोवाच गोविन्दं सूतपुत्रवधोद्यतः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
पार्थः संशप्तकगणं प्रविश्यार्णवसंनिभम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
पार्थः समन्तात्समरे प्रेषय़ामास मृत्यवे ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
पार्थपार्षतय़ोः पार्ष्णिं जग्राह पुरुषर्षभः ||
९२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
पार्थभूतममन्यन्त जगत्कालेन मोहिताः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
पार्थभूतममन्यन्त प्रेक्षमाणास्तथाविधम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
पार्थमन्ये महाराज रथस्थं जगृहुर्मुदा ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
पार्थमादाय़ गोविन्दो ददर्श च युधिष्ठिरम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
पार्थमाभाष्य संरम्भादिदं वचनमव्रवीत् ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य च पीडितम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
पार्थमेवाभ्यवर्तन्त मरणे कृतनिश्चय़ाः |
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पार्थवाणहता राजन्नराश्वरथकुञ्जराः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
पार्थवाणहताः केचिन्निपेतुर्विगतासवः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
पार्थवाहुवलोत्सृष्टा महाचापविनिःसृताः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
पार्थश्च पुनरष्टाभिस्तथा सर्वे त्रिभिस्त्रिभिः ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
पार्थश्च पुरुषव्याघ्रः शरैः संनतपर्वभिः |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
पार्थश्चाप्यव्रवीत्कृष्णं यथेष्टमिति केशव ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
पार्थसाय़कविद्धस्य दुर्लभं गर्जितं भवेत् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्तु प्रहसन्धीमानाचार्यं स शरौघिणम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थस्तु वरय़ामास शक्रादस्त्राणि सर्वशः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्तु विष्टभ्य वलाच्चरणौ परवीरहा |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्तु विष्टभ्य वलेन पादौ; भीष्मान्तिकं तूर्णमभिद्रवन्तम् |
९८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्य दृष्ट्वा मृदुय़ुद्धतां च; भीष्मं च सङ्ख्ये समुदीर्यमाणम् ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थस्य देवदेवेन शृणु सम्यक्समागमम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
पार्थस्य वनवासश्च उलूप्या पथि सङ्गमः |
९१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्य विजय़ं राजन्सर्व एवाभिसंश्रिताः ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थस्य शरजालानि विनिष्पेतुः सहस्रशः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्य सचिवः कृष्णो यथाभीशुग्रहो वरः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्य समरे कृष्णो यथाभीशुवरग्रहः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थस्य समरे दृष्ट्वा द्रोणस्याभूच्च विस्मय़ः ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
पार्थस्यामिततेजाः स पितुः स्नेहादपापकृत् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
पार्थस्यैव महावाहुः पार्श्वमागादरिन्दमः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
पार्था द्रोणं वधिष्यन्ति धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
पार्था विमनसो भूत्वा प्रैक्षन्त पितरं तव |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
पार्थाः समभ्यवर्तन्त भीमसेनपुरोगमाः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पार्थाः समेताः परमप्रहृष्टाः; शङ्खान्प्रदध्मुर्हतमीक्ष्य शल्यम् ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
धृतराष्ट्र उवाच
पार्थाः सर्वे च राजानः पृथिव्यां ये धनुर्धराः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
पार्थाच्च भय़माशङ्कन्परित्यागान्महीपतेः ||
१ ख