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शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
पालय़ित्वा प्रजाः सर्वा धर्मेण वदतां वर |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
पालय़िष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
पालय़िष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम् ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
पालय़िष्याम्यहं भौमं व्रह्म इत्येव चासकृत् ||
११२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
पालय़ेद्वापि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
पालय़ेद्वीर्यमाश्रित्य स ज्ञेय़ः पुरुषो मय़ा ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
पावकं कामसन्तप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् |
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
पावकश्च महातेजा महर्षिश्च वृहस्पतिः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
पावकश्चापि तं दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
पावकस्येन्द्रिय़ं श्वेते कृत्तिकाभिः कृतं नगे ||
२७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
पावकाम्वुनिधी भूत्वा पुनर्गरुडतक्षकौ |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
पावके विनिवृत्ते तु नीलो राजाभ्ययात्तदा |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
पावकेन परिक्षिप्तो दीप्यता तस्य चाश्रमः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
पावकेन समाय़ुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजय़त् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
पावकेनाधिशय़ता सन्तप्तास्तस्य तेजसा ||
४४ ग
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
पावको वासुदेवश्च अप्रतिष्ठो भवेदिति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पावनं तीर्थमासाद्य तर्पय़ेत्पितृदेवताः |
१५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
युधिष्ठिर उवाच
पावनं परमं चैव तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
पावनं पुरुषव्याघ्र यं वय़ं पर्युपास्महे ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
पावनं यत्परं नॄणामुग्रे कर्मणि वर्तताम् |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
पावनं सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
पावनात्पावकश्चासि वहनाद्धव्यवाहनः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
पावनार्थं च लोकस्य सरिच्छ्रेष्ठा भविष्यति ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
पावनार्थं नरश्रेष्ठ पुण्येन सलिलेन ह ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
पावनार्थं सागराणां तोषय़ित्वा महेश्वरम् ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
पाविता वै भविष्यन्ति पावनं परमं हि तत् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
जनमेजय़ उवाच
पाविताः स्म त्वय़ा व्रह्मन्पुण्यां कथय़ता कथाम् ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
पावितात्माद्य संवृत्तः श्रुत्वेमामादितः कथाम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
पावितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
पावितो हि त्वय़ा देहो लोके कीर्तिः स्थिरा च ते |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
पाशं च वरुणस्तत्र विचक्रं च तथा शिवः ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
पाशं तु वरुणो राजा वलवीर्यसमन्वितम् |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
शाकुनिक उवाच
पाशमेकमुभावेतौ सहितौ हरतो मम |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पाशोद्यतकराः केचिद्व्यादितास्याः खराननाः |
१०३ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
पाशोपधानां ज्यातन्त्रीं चापदण्डां महास्वनाम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
पाषण्डा दूषकाश्चैव समय़ानां च दूषकाः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रं प्रवेशय़ेत् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
पाषाण इव मेघोत्थैर्यथा विन्दुभिराहतः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १६५
गौरु उवाच
पाषाणदण्डाभिहतां क्रन्दन्तीं मामनाथवत् |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
पाषाणसङ्घातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
पाषाणय़ोधिनः शूरान्पार्वतीय़ानचोदय़त् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
पाषाणय़ोधिनः शूरान्यतमानानवस्थितान् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
पाषाणय़ोधिभिर्नूनं युय़ुधानः समागतः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमाय़वस्तथा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
पास्यन्तीमे जलं पश्चात्प्रतिवुद्धा जितक्लमाः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
पास्यामि तावत्पानीय़मिति पार्थो वृकोदरः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
पाहि देवान्सलोकांश्च महेन्द्र वलमाप्नुहि |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
पाहि सर्वाः प्रजाः सम्यक्षुभाशुभविदात्मवान् |
४ क