chevron_left  पाह्यस्मान्सर्वतोarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
पाह्यस्मान्सर्वतो राजन्देवानिव शतक्रतुः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
पाय़सं कृसरं मांसमपूपानथ शष्कुलीः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
पाय़सं कृसरं मांसमपूपाश्च वृथा कृताः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
पाय़सं चोरय़ित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्नुते ||
९७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
पाय़सं वा यवान्नं वा शाकं कृसरमेव वा |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
पाय़सं सर्पिषा मिश्रं द्विजेभ्यो यः प्रय़च्छति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
पाय़सैः सुमनोभिश्च तस्यापि यजनं स्मृतम् ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
पाय़ुनोत्क्रममाणस्तु मैत्रं स्थानमवाप्नुय़ात् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
पाय़ुरध्यात्ममित्याहुर्यथातत्त्वार्थदर्शिनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
पाय़ूपस्थौ विसर्गार्थमिन्द्रिय़े तुल्यकर्मणी |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
वोध्य उवाच
पिङ्गला कुररः सर्पः सारङ्गान्वेषणं वने |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
पिङ्गलां कुष्ठिनीं नारीं न त्वमावोढुमर्हसि ||
१२५ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
पिङ्गलो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददाय़कः ||
२२ ग
आदि पर्व
अध्याय २२३
द्रोण उवाच
पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन्हुताशन |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पिङ्गाक्षस्तपसः क्षेत्रं वलवान्नीललोहितः ||
७४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पिङ्गाक्षा नीलकण्ठाश्च लम्वकर्णाश्च भारत ||
९९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
पिङ्गाक्षाः शङ्कुकर्णाश्च वक्रनासाश्च भारत ||
९६ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पिङ्गातीर्थमुपस्पृश्य व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
७६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
पिङ्गाय़ाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
पिच्छिलः कोणपश्चक्रः कोणवेगः प्रकालनः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
पिण्डः पितृणां व्युच्छिद्येत्तत्तेषामप्रिय़ं भवेत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
पिण्डमात्रं व्यपाश्रित्य चरितुं सर्वतोदिशम् |
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
पिण्डशीर्षाहिवक्त्राश्च वृषदंशमुखा इव ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
पिण्डारक उपस्पृश्य एकरात्रोषितो नरः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पिण्डारके नरः स्नात्वा लभेद्वहु सुवर्णकम् ||
८२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
नारद उवाच
पिण्डारो विल्वपत्रश्च मूषिकादः शिरीषकः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
पिण्डीकृत्येन्द्रिय़ग्राममासीनः काष्ठवन्मुनिः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
पिण्डो देय़ो नरेणेह ततो मतिरभून्मम ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
पितरं चाप्यवज्ञाय़ कः प्रतिष्ठामवाप्नुय़ात् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
पितरं चाभिजानामि तमहं सौहृदात्सदा ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
पितरं चार्जुनं सङ्ख्ये न भीर्मामुपय़ास्यति ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
सूर्य उवाच
पितरं चैव ते मूढं यो न वेत्ति तवानय़म् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
पितरं तु निहत्यैवं दुस्तरा निष्कृतिर्मय़ा ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
पितरं तु परीप्सन्तः कर्णपुत्राः प्रहारिणः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
पितरं ते गमिष्यावः प्राणय़ोर्विपणे कृते |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३७
कृश उवाच
पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
पितरं तेऽभिसन्धाय़ तेजसा प्रज्वलन्निव ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
पितरं त्वेव गर्हेय़ं नात्मानं न सुय़ोधनम् |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
पितरं त्वेव शोचामि प्रज्ञानेत्रं जनेश्वरम् |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
पितरं दुःखितं चापि सुकन्येदमथाव्रवीत् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
पितरं दुःखिततरो गोविन्दो वाक्यमव्रवीत् ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
पितरं निहतं दृष्ट्वा किं नु वक्ष्यामि संसदि ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
पितरं नूनमाजिस्थं युध्यमानं परैः सह |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् ||
७ घ
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
पितरं भीमकर्माणं श्रुत्वा मे दुःखमाविशत् ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
पितरं मातरं चैव वृद्धौ शोकाय़ मा ददः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
पितरं मातरं वापि नास्य जानाति कश्चन ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
पितरं मातरं वापि यस्तु पुत्रोऽवमन्यते |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २५८
मार्कण्डेय़ उवाच
पितरं स समुत्सृज्य पितामहमुपस्थितः |
१३ क