वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
पिता माता च भगवन्नेतौ मे दैवतं परम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१९६
मार्कण्डेय़ उवाच
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यदा |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
पिता माता च सर्वस्य जगतः शाश्वतो गुरुः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रय़ः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
पिता माता तथैवाग्निर्गुरुरात्मा च पञ्चमः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
पिता मान्यो गुरुः श्रेष्ठो यदाह पृथिवीपतिः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
पिता मे ध्रिय़ते देव माता चान्ये च वान्धवाः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
पिता मे निहतः क्षुद्रैः सुनृशंसेन कर्मणा |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
पिता मे योत्स्यते वृद्धः सह पुत्रैर्महारथैः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पिता यदाह धर्मः स वेदेष्वपि सुनिश्चितः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
पिता यद्यनुगच्छेन्मां क्रोशमानः शुकेति वै ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
पिता यद्यस्य वरुणो मज्जय़ैनं जलाशय़े ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
पिता यवीय़ानस्माकं क्षत्ता धर्मभृतां वरः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
पिता राजा च वृद्धश्च सर्वथा मानमर्हति |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
पिता श्रेष्ठः सुहृद्यश्च सम्यक्प्रणिहितात्मवान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
पिता स ते वेदनिधिर्वरिष्ठो; महातपा वै तपसो निवासः |
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
पिता सखाय़ो गुरवः स्त्रिय़श्च; न निर्गुणा नाम भवन्ति लोके |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
पिता सुतं त्यजति सुहृद्वरं सुहृ; त्तथैव पुत्रः पितरं शरातुरः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता परमकं तपः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
पिता हि राजा राष्ट्रस्य प्रजानां योऽनुकम्पकः |
१०० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
पिता ह्यग्निर्गार्हपत्यो माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पिता ह्यल्पतरं स्थानं चिन्तय़िष्यामि मातरम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
पिता ह्यात्मानमाधत्ते जाय़ाय़ां जज्ञिय़ामिति |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
पितापि तव धर्मज्ञ गर्भे तस्मिन्महामते |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
पितापि ते समासीनमुपासीतैव मामधः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
पितापुत्रौ च विज्ञेय़ौ तय़ोर्हि व्राह्मणः पिता ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
पितापुत्रौ महेष्वासावभ्यवर्तत दुर्जय़ौ ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
पितामह निवोधेदं यत्त्वा वक्ष्यामि भारत |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ कुरूणां कीर्तिवर्धन |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ पुण्डरीकाक्षमच्युतम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ युधि सत्यपराक्रम |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ संशय़ो मे महानय़म् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महावाहो सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
पितामह यथेष्टं मां वाक्षरैरुपकृन्तसि |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
दुर्योधन उवाच
पितामह विजानीषे पार्थेषु विजय़ं कथम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्गम्य युधिष्ठिरः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
पितामहं च के तस्यां सभाय़ां पर्युपासते ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
दुर्योधन उवाच
पितामहं च द्रोणं च कृपं कर्णं च दुर्जय़म् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
पितामहं त्रिभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
पितामहं नमस्कृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ||
१०२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
पितामहं नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च |
११ क