वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाच हसन्पार्थो मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
प्रत्युवाचाथ तद्रक्षो धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्युवाचानुपूर्व्येण धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षसमन्विताः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
प्रत्यूचुरभिसम्पूज्य मुनिश्रेष्ठं प्रजापतिम् ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यूषकाले शिविरात्प्रतिगन्तुमिय़ेष सः |
१३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
प्रत्यूषकाले शोकार्तः प्राधावं नगरं प्रति ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च प्रभाताय़ाः सुतौ स्मृतौ ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टाविति स्मृताः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्नाथ देवलम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
प्रत्येकशः प्रभिद्यन्ते यैः शरीरं विचेष्टते ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
प्रत्येता न समः कश्चिद्युधि गाण्डीवधन्वनः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
प्रत्येत्य च स तत्सर्वं चकारोक्तं यमेन तत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमव्रवीत् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रथमं तैर्ग्रहीतव्यं मत्स्यानां गोधनं महत् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रथमं दानवांश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रथमं प्रतिवुध्यामि चरमं संविशामि च |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
प्रथमं यः समाख्यातः शीलवानिति संसदि |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
प्रथमं व्रह्मणः पुत्रं धर्ममाहुर्मनीषिणः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं प्रेत्य प्रतीक्षते |
४५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
प्रथमं समानो व्यानो व्यस्यते कर्म तेन तत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
प्रथमं सर्गमित्येतदाहुः प्राधानिकं वुधाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
प्रथमः प्रथमे मार्गे प्रवहो नाम सोऽनिलः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
प्रथममपि पलाय़िते त्वय़ि; प्रिय़कलहा धृतराष्ट्रसूनवः |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
उमो उवाच
प्रथमा सर्वसरितां नदी सागरगामिनी ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रथमेनाज्यभागेन पूज्यते योऽग्निरध्वरे |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
प्रथमो वा द्वितीय़ो वा पृथिव्यामिति मे मतिः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादग्निरजाय़त |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादस्यानलोऽभवत् ||
८१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
प्रथमोत्पादितं कृष्ण मेध्यमश्वमवासृजः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
प्रथितः पञ्चमः सोमादाय़ोः पुत्रो नराधिप ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
प्रथितः पुण्डरीकाक्ष प्रधानगुणकल्पितः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रथितः सागरान्ताय़ां रथय़ूथपय़ूथपः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
प्रथिता धनतश्चेय़ं पृथिवी साधुभिः स्मृता ||
१२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
प्रथितो गोपतिर्नाम नदी यस्याभवत्प्रिय़ा |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापतेः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रथय़िष्यति वै लोकान्पृथुरित्येव शव्दितः |
१३० क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणं गिरिं कृत्वा प्रय़यौ द्वारकां प्रति |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान्वनस्पतीन् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
प्रदक्षिणं च क्रिय़ते मामेवं कुरु भास्कर ||
३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
प्रदक्षिणं चैनमुपाचरन्ति; महर्षय़ः संस्तुतिभिर्नरेन्द्रम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणं ततः कृत्वा यय़ातिपतनं व्रजेत् |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
प्रदक्षिणं ततश्चक्रे प्रय़तः शिरसा नमन् |
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणं तौ प्रगृहीतपाणी; समानय़ामास स वेदपारगः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
प्रदक्षिणं प्रसव्यं च ग्राममध्ये न चाचरेत् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रदक्षिणं यः कुरुते पृथिवीं तीर्थतत्परः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
प्रदक्षिणं यः पृथिवीं करोत्यमितविक्रम |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
प्रदक्षिणं लोभय़न्ती मां शुभे रुचिरानना ||
२ ख