chevron_left  पितृदेवनिवासेषुarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
पितृदेवनिवासेषु सन्तापश्चाप्यजाय़त ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
पितृदेवमहर्षीणामानृण्याय़ानसूय़कः ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
पितृदेवर्षिमनुजदेय़ैः शतसहस्रशः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
पितृदेवर्षिसङ्घेभ्यो वरे दत्ते महात्मना |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
पितृदेवातिथिकृते समारम्भोऽत्र शस्यते |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
पितृदेवातिथिकृते साधनं कुरुते च यः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
पितृदेवातिथिमुखा हव्यकव्याग्रभोजिनः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
पितृदेवातिथींश्चैव यथावत्तेऽभ्यपूजय़न् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
पितृदेवातिथीनां च तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
पितृदेवातिथेय़ाश्च नित्योद्युक्तास्तथैव च |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
पितृदेवार्चनरता वभूव विजने वने ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पितृदेवार्चनरतो वाजपेय़मवाप्नुय़ात् ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
पितृदैवतविप्रेभ्यो निर्वपन्तो यथाविधि ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
पितृदैवतय़ज्ञेषु प्रोक्षितं हविरुच्यते |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
पितृनामानि च रणे गोत्रनामानि चाभितः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
पितृनेतानहं पार्थ देवमानुषसत्तमान् ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
पितृन्देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पय़न् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
पितृन्देवानृषीन्विप्रान्गन्धर्वोरगराक्षसान् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
पितृन्सन्तर्पय़ामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
पितृपक्षे हि ते पार्था मातृपक्षे च वृष्णय़ः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
पितृपुत्रवधं प्राप्य पुमान्कः परिहापय़ेत् |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
पितृपैतामहं कर्म कुर्वाणमतिमानुषम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
द्रोण उवाच
पितृपैतामहं मार्गमनुय़ाहि नराधिप ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान्स्वेन तेजसा |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २४७
व्यास उवाच
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
पितृपैतामहं राज्यमपवृत्तं तदानघ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
पितृपैतामहं राज्यमास्थाय़ दुरमुद्वह |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
पितृपैतामहं राज्यमिह भोक्ष्यन्ति ते सुताः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
पितृपैतामहं वृत्तं कच्चित्पार्थानुवर्तसे |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १३०
वैशम्पाय़न उवाच
पितृपैतामहाद्राज्यात्ससहाय़ो विशेषतः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
पितृपैतामहीं गुर्वीमुद्वहन्ति धुरं सदा ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
पितृपैतामहीं वृत्तिमास्थाय़ धुरमुद्वह ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
पितृपैतामहे मार्गे निय़ोक्तुमहमुत्सहे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
पितृपैतामहे राज्ये धुरमुद्वोढुमर्हसि ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
व्राह्मण उवाच
पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
व्राह्मण उवाच
पितृपैतामहे राज्ये वश्ये जनपदे सति |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
पितृपैतामहे वृत्ते वोढव्ये तेऽन्यथा मतिः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
पितृपैतामहे वृत्ते शाधि राज्यं यथोचितम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
पितृपैतामहो यः स्यात्स मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पितृप्रसादादिच्छेय़ं तपसाप्याय़नं पुनः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
पितृभक्तो दृढतपाः पितुः सुदय़ितः सुतः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
पितृभक्तो माघमासमेकभक्तेन यः क्षपेत् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वासुदेव उवाच
पितृभक्तोऽसि राजर्षे मार्कण्डेय़ इवापरः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मां चैव शरणं गतः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
पितृभिः सह सालोक्यं मा स्म गच्छेद्वृकोदरः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
पितृभिः सहितान्राजन्परीप्सन्हितमात्मनः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैव श्वशुरैरथ देवरैः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ||
१० ख