आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
परिगृह्य समाविष्टस्तद्वनं भरतर्षभ |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
परिगृह्य हि यद्युद्धे धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
परिगृह्याग्रतो राजञ्जघ्नतुः शतशः परान् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
परिग्रहं करिष्यन्ति पापाचारपरिग्रहाः ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रिय़ः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
परिग्रहं परित्यज्य भव वुद्ध्या यतव्रतः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
परिग्रहवता तन्मे प्रत्यक्षमरिसूदन ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
परिग्रहाः शुभाः सर्वे गुणतोऽभ्युदय़ाश्च ये |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्चैव तेजसा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
परिग्रहान्परित्यज्य भवेद्वुद्ध्या जितेन्द्रिय़ः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
परिग्रहे व्राह्मणानामश्वत्थामानमुक्तवान् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
परिग्रहेण व्राह्मेण परिगृह्य महाद्युतिः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
परिघं च वटं चैव भीमं च सुमहावलम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
परिघमुसलशक्तितोमरै; र्नखरभुशुण्डिगदाशतैर्द्रुताः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
परिघाणां प्रवृद्धानां मुद्गराणां च मारिष |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
परिघान्पट्टिशांश्चैव भिण्डिपालांश्च मारिष ||
५१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
परिघृष्टिका वैघसिकाः सम्प्रक्षालास्तथैव च |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
परिघेणातिकाय़ेन ताडय़ामास मूर्धनि ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
परिघैर्भिण्डिपालैश्च शतघ्नीभिस्तथैव च |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
परिघैश्च गदाभिश्च प्रासमुद्गरपट्टिशैः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
परिघैश्चाय़सैः पीतैः संनिकर्षे च मुष्टिभिः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
परिघो नाम चण्डालः शस्त्रपाणिरदृश्यत ||
११० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
परिचर्या च शुश्रूषा सेवा तृष्णा व्यपाश्रय़ः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
परिचर्या वन्दनं व्राह्मणानां; नाधीय़ीत प्रतिषिद्धोऽस्य यज्ञः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
परिचर्यां च रक्षां च चक्रतुर्हृष्टमानसौ ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
परिचर्यां वने तां तु क्षुत्प्रतीघातकारिकाम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
परिचर्यां स्वकां तस्मै यथावत्प्रत्यवेदय़त् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
परिचर्यान्नसंस्कारास्तदाय़त्ता भवन्तु वः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
परिचर्यावरोद्धारो ये च केचन वल्गिनः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
परिचर्योऽस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कय़ा ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
परिचारेण महता गुरुं वैद्यमतोषय़त् ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
परिचारेषु तीर्थेषु विविधेष्वाकरेषु च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
परिचारैर्गुणैश्चैव प्रश्रय़ेण दमेन च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
परिचारय़ज्ञाः शूद्राश्च जपय़ज्ञा द्विजातय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
परिचारय़ज्ञाः शूद्रास्तु तपोय़ज्ञा द्विजातय़ः ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
परिचिक्षेप तान्नागः स रिपून्सव्यदक्षिणम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
परिचिक्षेप वीभत्सुः सर्वतः प्रक्षिपञ्शरान् ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
परिचिन्त्य तु पार्थेन संनिपातो न नः क्षमः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
परिच्छदेन क्षेत्रेण वेश्मना परिचर्यया |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
परिच्छन्नो यय़ौ पार्थो भ्रातृभिः सह पाण्डवः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणाम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
परिच्छिन्नैः काष्ठतृणैर्मय़ेदं शरणं कृतम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
परिणाममविज्ञाय़ तदन्तं तस्य जीवितम् ||
७७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
परिणामश्च वय़सः सर्ववन्धुक्षय़श्च मे |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
परिणाम्य निशां तां तु भारद्वाजो महारथः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
परिणाम्य निशां तां तु सुखसुप्ता जनेश्वराः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
परिणाहस्तु वृक्षस्य फलानां रसभेदिनाम् ||
२१ ख