स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
पीतशोणितसर्वाङ्गो भीमसेनेन पातितः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
पीता भास्वरवर्णाभा वभूवुर्वनराजय़ः |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
पीतानाकाशसङ्काशानसीन्केचिच्च चिक्षिपुः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
पीतानि शस्त्राण्यसृगुक्षितानि; वीरावधूतानि तनुद्रुहाणि |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
पीतामृतस्येवात्यन्तमिह चामुत्र वा भय़म् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
पीतेषु शस्त्रेषु च पावकस्य; प्रतिप्रभास्तत्र ततो वभूवुः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
पीतोदकां जग्धतृणां नष्टदुग्धां निरिन्द्रिय़ाम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
पीतोपवृत्तान्स्नातांश्च जग्धान्नान्समलङ्कृतान् |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
पीत्वा च शोणितं तत्र वसां पीत्वा च भारत |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
पीत्वा च शोणितं हृष्टाः प्रानृत्यन्गणशोऽपरे |
१३१ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पीत्वा जगदिदं विश्वमेतदाख्यातुमर्हसि ||
१२६ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४१
हिडिम्व उवाच
पीत्वा तवासृग्गात्रेभ्यस्ततः पश्चादिमानपि |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
पीत्वा वारि समाश्वस्तौ तथैवास्तामरिन्दमौ ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
पीत्वा सीधुं सगोमांसं नर्दन्ति च हसन्ति च ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
पीत्वामृतमिव प्राज्ञो ज्ञानतृप्तो भविष्यसि ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
पीत्वैव यान्यभ्यधिकः प्रहर्षो; ममाभवद्भूश्चलितेव चासीत् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
पीनस्कन्धोरुवाहुश्च धैर्येण हिमवानिव ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिताः ||
११३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
पीनांसं द्वादशभुजं पावकादित्यवर्चसम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पीवानसि |
४३ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पीवानसि |
४७ 5
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
पीवानसि दृढमिति ||
३५ घ
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
पीय़तां दीय़तां चेति वाच आसन्गृहे गृहे ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पीय़ते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
पीय़मानं च रक्षोभिर्वहुभिर्नृपसत्तम ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
पीय़मानं समुद्रं तु दृष्ट्वा देवाः सवासवाः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
पीय़माने च सर्वस्मिंस्तोय़े वै सलिलेश्वरः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
पुंनागान्सप्तपर्णांश्च कर्णिकारान्सकेतकान् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
पुंनागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
पुंवद्विधानय़ुक्तानि शिखण्डीति च तां विदुः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
पुंश्चलः पापय़ोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
पुंसः परीक्षितान्प्राज्ञान्क्षुत्पिपासातपक्षमान् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
पुंसा सह समाय़ोगो न स धर्मोपघातकः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
पुंसामिष्टश्च विषय़ो मैथुनाय़ न संशय़ः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
पुंस्कामां शङ्कमानश्च चुक्रोध पुरुषादकः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोऽपि संवत्सरं नृप ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
पुंस्कोकिलनिनादेषु षट्पदाभिरुतेषु च |
२० क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
पुंस्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवञ्जीवकनादितम् ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
पुंस्कोकिलरुतं श्रुत्वा रूक्षा ध्वाङ्क्षस्य वागिव ||
२३६ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
पुंस्कोकिलरुताश्चैव क्रौञ्चवर्हिणनादिताः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
पुंस्कोकिलस्येव च तस्य वाणी; तां शृण्वतो मे व्यथितोऽन्तरात्मा ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
पुंस्त्वादभिमदत्वाच्च केचिदत्र महागजाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
पुच्छण्डको मण्डलकः पिण्डभेत्ता रभेणकः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
पुच्छमासन्महाराज शूरसेनाश्च सर्वशः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
पुच्छे आस्तां महावीरौ भ्रातरौ पार्थिवौ तदा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
पुच्छे वैकर्तनः कर्णः सपुत्रज्ञातिवान्धवः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
पुच्छैः शिरोभिश्च भृशं चित्रभानुं प्रपेदिरे ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
पुञ्जीकृताश्च शतशः परस्परवधेप्सय़ा ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षय़मक्षरम् |
६ क