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स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्डरीकनिभा भाति पुण्डरीकान्तरप्रभा |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नरः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पुण्डरीकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेन्नरः ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
पुण्डरीकमवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
पुण्डरीकमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ||
९९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्डरीका सुगन्धा च सुरथा च प्रमाथिनी ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
पुण्डरीकांश्च कार्त्स्न्येन यतसे कर्तुमात्मवान् ||
८९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्डरीकाक्ष पश्यस्व पौत्रं पार्थस्य धीमतः |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्डरीकाक्ष पश्यस्व वालाविह विनाकृतौ |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
पुण्डरीकाक्ष भद्रं ते गच्छ त्वं मधुसूदन |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
पुण्ड्रस्यापततो नागं चलन्तमिव पर्वतम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
पुण्ड्रा भार्गाः किराताश्च सुदोष्णाः प्रमुदास्तथा ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
पुण्ड्रान्किरातान्द्रमिडान्सिंहलान्वर्वरांस्तथा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यमेवाश्नुते फलम् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
पुण्यं च नैमिषं तीर्थं वाहुदां करतोय़िनीम् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
पुण्यं च मे स्याच्चरितं महार्थं; मुच्येरंश्च कुरवो मृत्युपाशात् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
पुण्यं च मे स्याच्चरितं महोदय़ं; मुच्येरंश्च कुरवो मृत्युपाशात् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११
अर्जुन उवाच
पुण्यं च वत कर्मैषां प्रशस्तं चैव जीवितम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
पुण्यं चाकाशगङ्गाय़ास्तोय़ं विष्टभ्य तिष्ठति ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
पुण्यं चाख्याय़ते दिव्यं शिवमग्निशिरोऽनघ |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
पुण्यं तत्ख्याय़ते राजन्व्रह्मर्षिगणसेवितम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं तीर्थवरं दृष्ट्वा विस्मय़ं परमं गतः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
पुण्यं त्रिलोकविख्यातं सर्वपापहरं शिवम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं द्वैतवनं राजन्नाजगाम हलाय़ुधः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं पद्मसरोपेतं सपल्वलमहावनम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
पुण्यं पुण्येषु विमलं पापं पापेषु चाप्नुय़ात् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
पुण्यं प्रज्ञां वर्धय़ति क्रिय़माणं पुनः पुनः |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं प्रभासं समुपाजगाम; यत्रोडुराड्यक्ष्मणा क्लिश्यमानः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं प्राणान्धारय़ति पुण्यं प्राणदमुच्यते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यं मे सुमहद्राजंश्चरितं स्यान्महाफलम् ||
८० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
पुण्यं श्रुत्वैतदाख्यानं महाराज सुतस्तव |
११ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
पुण्यं स फलमाप्नोति राजसूय़ाश्वमेधय़ोः ||
७६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं च पर्वतम् |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८५
भृगुरु उवाच
पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स वरो लोक उच्यते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
पुण्यः परमकश्चैव मेध्यकामैरुपास्यते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
पुण्यः सोमगिरिश्चैव तथैवान्ये महीधराः |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छन्तनुः कुरुसत्तम ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
पुण्यकर्मभिराख्याता देवर्षिकथिताः कथाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गं जगामावृत्य रोदसी ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
पुण्यकीर्ती राजपुत्री द्रौपदी वीरसूरिय़म् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यकृद्भिर्महासत्त्वैस्तापसैः सह पाण्डवाः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
पुण्यक्षय़मिव प्राप्य पतन्तं स्वर्गवासिनम् ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
पुण्यगन्धः सुखस्पर्शो ववौ तत्र समीरणः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
पुण्यगन्धवहं राजञ्श्वसनं राजसत्तम ||
९२ ख