chevron_left  पश्चादहमथारोक्ष्येarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ४३
अर्जुन उवाच
पश्चादहमथारोक्ष्ये सुकृती सत्पथं यथा ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
पश्चादेष प्रय़ातव्यो न मे विघ्नकरो भवेत् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
पश्चाद्गङ्गां निषेवन्ते तेऽपि यान्त्युत्तमां गतिम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
पश्चाद्धर्मं चरिष्यामि पावनार्थं सुदुश्चरम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
पश्चाद्भुञ्जीत मेधावी न चाप्यन्यमना नरः ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
पश्चाद्रथस्य पतितान्क्षिप्ताञ्शीघ्रं हि गच्छतः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चान्नारदमव्यग्रौ पाद्यार्घ्याभ्यां प्रपूज्य च |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
पश्चान्मुखाः कुरवो धार्तराष्ट्राः; स्थिताः पार्थाः प्राङ्मुखा योत्स्यमानाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चार्धे च स कृष्णस्य प्रह्वोऽतिष्ठत्कृताञ्जलिः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
पश्चार्धे तस्य पद्मस्तु गर्भव्यूहः सुदुर्भिदः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
पश्चिमं मे मुखं सौम्यं सर्वप्राणिसुखावहम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
पश्चिमा वारुणी दिक्च धार्यते वै सुभद्रय़ा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
भीष्म उवाच
पश्चिमां तावदेवापि तथोदीचीं दिवाकरः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
पश्चिमां दिशमाश्रित्य य एधन्ते निवोध तान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चिमां दिशमास्थाय़ गिरमुच्चारय़न्प्रभुः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
पश्चिमानि च राज्यानि शतशः सागरान्तिकान् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
पश्चिमानूपकं विद्धि तं नृपं नृपसत्तम ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
पश्चिमाय़ां तु सन्ध्याय़ामुपस्पृश्य यथाविधि ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १०८
सुपर्ण उवाच
पश्चिमेत्यभिविख्याता दिगिय़ं द्विजसत्तम ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
पश्य कङ्कांश्च गृध्रांश्च समवेतान्सहस्रशः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्ण महाघोरं भय़दं लोमहर्षणम् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्ण महावाहुं क्रुद्धं पाण्डवनन्दनम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्ण यथा सेना पाण्डवैरर्दिता भृशम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्णं महेष्वासं धनुष्पाणिमवस्थितम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्णं रणे पार्थ श्वेतच्छविविराजितम् |
३८ क
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
पश्य कर्णस्य पत्नीं त्वं वृषसेनस्य मातरम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्णार्जुनस्यैताः सौदामिन्य इवाम्वुदे ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
पश्य कर्णेन हैडिम्व पाण्डवानामनीकिनी |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
शल्य उवाच
पश्य कुन्तीसुतं वीरं भीममक्लिष्टकारिणम् |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
पश्य कृष्ण महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
पश्य कृष्ण महावाहो भार्गवास्त्रस्य विक्रमम् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
पश्य कृष्ण महावाहो संशप्तकगणान्मय़ा |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
पश्य कृष्णसहाय़ेन पाण्डवेन किरीटिना |
२ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
पश्य कौन्तेय़ पाणी मे नैवं यौ भवतः पुरा ||
२२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
पश्य कौरव्य राजानमपय़ातांश्च पाण्डवान् ||
१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य गन्धर्वराजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
पृथिव्यु उवाच
पश्य चन्द्रे कृतं लक्ष्म समुद्रे लवणोदकम् |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
कृप उवाच
पश्य चामीकराभस्य चामीकरविभूषिताम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
पश्य चाल्पेन कालेन निश्चय़ान्वेषणेन च |
११४ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य चेमान्महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतमान्वहून् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
पश्य चैतन्महावाहो वैशसं समुपस्थितम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २९०
सूर्य उवाच
पश्य चैनान्सुरगणान्दिव्यं चक्षुरिदं हि ते |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
पश्य तेषां कृपणतां पश्य तेषामवुद्धिताम् |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
पश्य त्वं गर्जितस्यास्य फलं मे विप्र सानुगः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
पश्य त्वं छिद्रभूतं हि जीवलोकं स्वकर्मणा |
८८ क
वन पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य दिग्विजय़े राजन्यथा भीमेन पातितः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्य दिव्यं सुरुचिरं भीम पुष्पमनुत्तमम् |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
पश्य दीप्ताङ्गदय़ुगप्रतिवद्धमहाभुजम् ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
पश्य दीप्तानि गोविन्द पावकान्सुहुतानिव ||
१८ ख