स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यमाना च दह्यामि शोकेनाहं जनार्दन ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
शार्ङ्गका ऊचुः
पश्यमाना भय़मिदं न शक्ष्यामो निषेवितुम् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
पश्यमानो यशो दीप्तं जरासन्धमुपाश्रितः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यसीवाप्रतीपानि किं त्वां भीर्भीम विन्दति ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यस्येनं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि वेत्युत ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
लोमश उवाच
पश्यस्वैतन्मय़ा सार्धं पुण्यं पापप्रमोचनम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
पश्यस्वैनं विरथं युध्यमानं; रणे केतुं सर्वधनुर्धराणाम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
पश्याग्नय़श्च प्रतिशाम्यन्त्यभीताः; सन्तर्जिता दण्डभय़ाज्ज्वलन्ति ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
पश्यातिमान्यं राजानमपय़ातांश्च पाण्डवान् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
पश्यापरान्नरश्रेष्ठ सन्दष्टौष्ठपुटान्पुनः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
पश्यापश्यं योऽनुपश्येत्क्षेमं तत्त्वं च काश्यप |
७९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
पश्याप्रमादेन निहत्य शत्रू; न्सर्वान्महेन्द्रं सुखमेधमानम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
पश्याम राजन्संसक्तान्सैन्येन रजसावृतान् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यामस्ताञ्श्रिय़ा हीनान्पाण्डवान्वनवासिनः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यामस्त्रिषु लोकेषु न तं संस्थास्नुचारिषु |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
पश्यामस्त्वा महावाहो रथे सूर्यमिव स्थितम् ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
पश्यामि कर्णं कौन्तेय़ देवराजमिवाहवे |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
पश्यामि कर्णं समरे विचरन्तमभीतवत् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
पश्यामि च तथा कर्णं विचरन्तमभीतवत् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् ||
१०३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्यामि च महीं राजन्काननैरुपशोभिताम् ||
९८ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् ||
१०२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
करालजनक उवाच
पश्यामि चाभिसन्दिग्धमेतय़ोर्वै निदर्शनम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
पश्यामि जय़विक्रान्तं क्षपय़िष्यति नो ध्रुवम् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
पश्यामि तत्र तत्रैव कर्णभूतमिदं जगत् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दिशो नश्यन्ति मे तदा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
पश्यामि त्वा विराजन्तं देवराजमवस्थितम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं; स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता; द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेय़म् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
पश्यामि त्वां महाभाग तुल्यलोष्टाश्मकाञ्चनम् ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे; सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
पश्यामि द्रवतीं सेनां पाञ्चालानां जनार्दन |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
करालजनक उवाच
पश्यामि भगवंस्तस्मान्मोक्षधर्मो न विद्यते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यश्च याः स्त्रिय़ः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
पश्यामि लोकानमलाञ्छुचीन्व्राह्मणय़ाय़िनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यामि वहुलान्राजन्वृक्षानुदकसंश्रय़ान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
पश्यामि साक्षिवल्लोके देहस्यास्य विचेष्टनात् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
पश्यामि स्वं समुत्थानमुपजीवन्ति जन्तवः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
पश्यामीवाग्रतो भीमं क्रोधमूर्छितमाहवे ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम् ||
४३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
पश्यामो निहतं त्वां चेद्भीमसेनेन संय़ुगे ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
पश्याम्यस्मिन्वने कष्टे अमनुष्यनिषेविते |
१२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
पश्याम्यहं युक्तरूपांस्तथैव; तामेव सिद्धिं श्रावय़ेथा नृपं तम् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
पश्याम्यहत्वा पाञ्चालान्सह तेन शिखण्डिना ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
पश्याम्येनं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
पश्यार्जुन महाव्यूहं कर्णेन विहितं रणे |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
पश्ये दोषं ध्रुवं युद्धे तथा युद्धे पराभवम् |
१३ क