chevron_left  पुत्रसङ्क्रामितश्रीस्तुarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
पुत्रसङ्क्रामितश्रीस्तु वने वन्येन वर्तय़न् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९३
मार्कण्डेय़ उवाच
पुत्रसङ्क्रामितश्रीस्तु वृहदश्वो महीपतिः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
पुत्रस्तमनुरक्ताभूत्पृथिवी सागराम्वरा ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्तव महाराज कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तव महाराज मद्रराजमिदं वचः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु तव तं दृष्ट्वा भीमार्जुनसमागमम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु तव तेजस्वी भीमसेनेन ताडितः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु तव दुर्धर्षो नकुलस्य महाहवे |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु तव राजेन्द्र रथाद्धेमपरिष्कृतात् |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तः सौभद्रस्याप्लुतो रथम् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तो विवित्सो रथमाविशत् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु ते महाराज रथस्थो रथिनां वरः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्तु शिशुपालस्य सुकेतुः पृथिवीपते |
८२ क
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
पुत्रस्तु शृणु राजेन्द्र यादृशोऽय़ं भविष्यति ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्ते दुर्जय़श्चैव जय़श्च विजय़श्च ह |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्ते दुर्मुखो राजन्दुःसहश्च महारथः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
पुत्रस्ते दय़ितो नित्यं शोऽश्वत्थामा निपातितः ||
११६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्चास्य दिवं स्पृशेत् ||
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्चास्य दिवस्पृशम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्ते प्रतिविन्ध्यश्च सुतसोमस्तथा विभुः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्ते योधय़ामास पाण्डवानामनीकिनीम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
सुधन्वो उवाच
पुत्रस्नेहं परित्यज्य यस्त्वं धर्मे प्रतिष्ठितः |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्नेहस्तु धर्मात्मन्धैर्यान्मां समचालय़त् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
पुत्रस्नेहस्तु वलवान्धृतराष्ट्रस्य माधव |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
पुत्रस्नेहात्परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय़ माधव ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
पुत्रस्नेहान्महावाहुः सुखं पर्यचरत्तदा ||
११ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
पुत्रस्नेहाभिभूतश्च हितमुक्तो मनीषिभिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
पुत्रस्नेहाभिभूतानां युष्माकं शोचतां भृशम् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
पुत्रस्नेहाभिभूतेन मय़ा चाप्यकृतात्मना |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
पुत्रस्नेहाभिसन्तप्ता जननी वाक्यमव्रवीत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
पुत्रस्नेहेन भगवञ्जानन्नपि यतव्रत ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्नेहेन राजेन्द्र करुणं पर्यदेवय़त् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्पर्शात्सुखतरः स्पर्शो लोके न विद्यते ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्य कृत्वा कार्याणि स्नुषाभ्यां सह भारत ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्य तव चात्यर्थं विषादः समपद्यत |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्य तव तद्वाक्यं श्रुत्वा शल्यः प्रतापवान् |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रस्य ते पुत्रशतं निहतं यद्रणाजिरे ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्य ते महाराज वधार्थं भरतर्षभ ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ४०
कृष्ण उवाच
पुत्रस्य ते वधार्हाणां मा त्वं शोके मनः कृथाः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
पुत्रस्य नो जीवदानाज्जीवितं दातुमर्हसि ||
१०८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
पुत्रस्य पाण्डुपाञ्चालान्मय़ा गुप्तो भवेत्ततः ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
सुधन्वो उवाच
पुत्रस्यापि स हेतोर्हि प्रह्रादो नानृतं वदेत् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
पुत्रस्यैतद्वचः श्रुत्वा तथाकार्षीत्पिता नृप |
३७ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रहन्ता नृशंसोऽहं तव देवि युधिष्ठिरः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रहार्दाद्धर्मय़ुक्तं गान्धारी शोककर्शिता ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
पुत्रहेतोः परामार्तिं जगाम मनुजर्षभ ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषोऽनुकीर्तितः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
पुत्रा इव पितुर्गेहे विषय़े यस्य मानवाः |
३३ क