वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्वं तु षोडशाद्वर्षाद्ये भवन्ति ग्रहा नृणाम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वं त्रिभ्योऽथ वर्षेभ्यो यजेताग्निष्टुता परम् |
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वं दृष्टिर्वाहवश्च एकाग्रं च मनोऽभवत् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वं देहविमोक्षान्ते भवन्त्येतासु योनिषु ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
ऊर्ध्वं देहात्कर्मणो जृम्भमाणा; द्व्यक्तं पृथिव्यामनुसञ्चरन्ति |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
ऊर्ध्वं देहाद्वदन्त्येके नैतदस्तीति चापरे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदर्वागूर्ध्वं च पश्यति |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वं पुच्छान्विधुन्वाना रेभमाणाः समन्ततः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आय़ति |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आय़ति |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
ऊर्ध्वं भवति सन्देहादिह दृष्टार्थमेव वा |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
ऊर्ध्वं यज्ञः पशुभिः सार्धमेति; सन्तर्पितस्तर्पय़ते च कामैः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वं यय़ौ दीप्यमाना निशाय़ां; नक्षत्राणामन्तराण्याविशन्ती ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
ऊर्ध्वं रसानां ददते प्रजाभ्यः; सर्वान्यथा सर्वमनित्यतां च ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वं स देहात्सुव्यक्तं विमुच्येदिति नान्यथा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
ऊर्ध्वं हित्वा प्रतिष्ठन्ते प्राणाः पुण्यकृतां नृप |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वकेशोऽतिलोमाङ्गः श्येनोलूकस्तथैव च |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
ऊर्ध्वगः सत्पथः शश्वद्देवय़ानचरो मुने ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ||
११५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः ||
१३२ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
ऊर्ध्वदृष्टिर्ध्यानपरा वभूवोन्मत्तदर्शना |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वदृष्टिर्महालिङ्गो मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् |
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्वभागूर्ध्वभाङ्नाम कविः प्राणाश्रितस्तु सः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमन्तश्च तिर्यक्च लोकानावृत्य तिष्ठति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमाक्रममाणाश्च शरजालेन वारिताः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
ऊर्ध्वमाचक्रमे द्रष्टुं भास्करं भास्करद्युतिः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमाचक्रमे धीमान्प्रहृष्टः कुरुनन्दनः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्वमाचक्रमे राजा विधाय़ नगरे विधिम् ||
५२ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमाचक्रमे शीघ्रं तेजसावृत्य रोदसी ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमाचक्रमे सा तु पन्नगी पुत्रगृद्धिनी ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्वमाचक्रमे सीतां गृहीत्वाङ्केन राक्षसः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य कवचं शरीरे प्रत्यमुञ्चत |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वमुत्पत्य वेगेन निपेतुः पावके पुनः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्वस्तां माय़ां माय़यावधीत् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वमेकोनविंशत्याः कालो नामापरो गुणः |
१०९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वमेवाभ्यवेक्षन्त दुःखत्रस्तान्यनेकशः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वरश्मिरिवादित्यो विवभौ तत्र पाण्डवः ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वरेखतलौ पादौ पार्थस्य शुभलक्षणौ |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वरेतसमात्मानं चकार पुरुषर्षभः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशाय़ी नभस्तलः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
दुःषन्त उवाच
ऊर्ध्वरेता महाभागो भगवाँल्लोकपूजितः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वरेता वृषामित्रः सुहोत्रो होत्रवाहनः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वरेता ह्यराजा च कुलस्यार्थे पुनः पुनः ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
ऊर्ध्वरेताः प्रजाय़ित्वा गच्छत्यक्षरसात्मताम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४२
जरत्कारुरु उवाच
ऊर्ध्वरेताः शरीरं वै प्रापय़ेय़ममुत्र वै ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
ऊर्ध्वरेताः समभवत्ततःप्रभृति चापि सः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ऊर्ध्वरोमा हरिश्मश्रुः शङ्कुकर्णो महाहनुः ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववाहुः स्मरन्मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः |
४१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्ववाहुभिरार्ताभिर्व्रुवतीभिः प्रिय़ाप्रिय़े ||
६ ख