शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
फलं कर्म च निर्हेतु न कश्चित्सम्प्रवर्तय़ेत् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
फलं कर्म च सम्प्रेक्ष्य ततः सर्वं प्रकल्पय़ेत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
फलं कर्मात्मकं विद्यात्कर्म ज्ञेय़ात्मकं तथा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
फलं च जनय़त्येवं न चास्योद्विजते जनः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वृत्तिमेव च ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
फलं चाशु प्रय़च्छन्ति वीजमुप्तमृताविव ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
फलं चैव यथातत्त्वं प्रेत्य चेह च सर्वशः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
फलं तत्राक्षय़ं तस्य वर्धते भरतर्षभ ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
फलं तस्यावलेपस्य द्रक्ष्यस्यद्य न संशय़ः ||
१४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
फलं त्वमसि तिग्मांशो निमेषादिषु कर्मसु |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपाश्नुते |
११२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम् |
७१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
फलं पुरुषकारस्य सदा सन्दृश्य तत्त्वतः ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
फलं पुरुषमेधस्य लभेन्मासं कृतोदकः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
फलं प्रकल्प्य पूर्वं हि ततो यज्ञः प्रताय़ते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
फलं प्राप्तं तत्प्रय़च्छ मम दित्सुर्भवान्यदि ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
फलं प्राप्नोति विपुलं देवलोके च पूज्यते |
१०८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
फलं प्राप्य महद्दुःखं निमग्नः शोकसागरे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
फलं महद्भिर्यदुपास्यते च; तत्किं कथं वा भविता क्व वा तत् ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
फलं मूलं च वुभुजे राज्ञा दत्तं सहानुजः ||
३६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
युधिष्ठिर उवाच
फलं वलिविधाने च तद्भूय़ो वक्तुमर्हसि ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
फलं वहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नरः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
फलं वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिकः ||
९८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
फलं विश्वजितस्तात प्राप्नोति स नरो नृप ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
फलं षड्विंशदष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
फलकान्यथ चर्माणि प्रतिकल्प्यान्यनेकशः |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
फलकामो यशस्कामः पुष्टिकामश्च नित्यदा |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
फलतो भूमितो वापि प्रतिपद्यस्व भारत ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
फलत्यथ सुखार्हो वा दुःखार्हो वापि जाय़ते ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
फलत्येव ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवोदरे ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
फलदं त्विह विज्ञाय़ धातारं श्रेय़सि ध्रुवे |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
फलनिर्वृत्तिरिद्धा स्यात्तन्नृशंसतरं भवेत् ||
६६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
फलन्त्यृतुषु वृक्षाश्च पुष्पाणि च फलानि च ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
फलपत्रावरैर्मूलैः श्यामाकेन च वर्तय़न् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
फलपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवानसौ ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
फलपत्रोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
तक्षक उवाच
फलपत्रोदकं नाम प्रतिग्राहय़ितुं नृपम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
फलप्राप्तिं न जानामि दत्तं यज्जपितं मय़ा |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
फलप्राप्तिस्तव श्रेष्ठा यमोऽहं त्वामुपव्रुवे ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
फलभक्षेण राजर्षे पश्य कर्मात्रिणा कृतम् ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
फलभारनतं यद्वत्स्वादुवृक्षं विहङ्गमाः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
फलमद्य प्रपद्यस्व कर्मणस्तस्य दुर्मते ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलसमुद्वाहैर्महद्भिश्चोपशोभितम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
फलमूलानिलभुजां मुनीनां वसतां वने |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
फलमूलामिषाहारा वनं यास्याम दुःखिताः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
फलमूलाम्वुभक्षोऽभूत्सहस्रं परिवत्सरान् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
फलमूलाशनं वाय़ुरापः शैवलभक्षणम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
फलमूलाशनं शान्तं नैच्छत्स पिशिताशनः ||
३८ ख