द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
भक्तं च मां भजमानं भजस्व; मा रीरिषो मामहिताहितेन |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
भक्तं प्रगृह्य मूर्ध्ना तद्वाहुभ्यां पार्श्वतोऽगमत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
भक्तं प्रति विशेषस्ते एष पार्थानुकीर्तितः ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
भक्तं भजेत नृपतिस्तद्वै वृत्तं सतामिह ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
भक्तं मां भज कल्याणि किमिच्छसि मनस्विनि |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
भक्तं मामसितापाङ्गे न परित्यक्तुमर्हसि |
१२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
भक्तत्यागं प्राहुरत्यन्तपापं; तुल्यं लोके व्रह्मवध्याकृतेन |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
भक्तश्च कुलपुत्रश्च शूरश्च पृतनापतिः |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
भक्तश्च मे महावाहुः प्रिय़ोऽस्याहं प्रिय़श्च मे |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
भक्ता नाराय़णं ये च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
भक्तां भजस्व मां पार्थ सतामेतन्मतं प्रभो |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
भक्तानां हि परित्यागो न धर्मेषु प्रशस्यते ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
भक्तानुकम्पिनं दान्तं न च नीचानुसारिणम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
भक्तानुकम्पिने नित्यं सिध्यतां नौ वरः प्रभो ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
भक्तानुकम्पी भगवांस्तस्य चक्रे ततो दय़ाम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
भक्तानुकम्पी भगवानात्मसंस्थान्करोति तान् ||
१५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
भक्तानुग्रहकृद्देवो यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
भक्तानुरक्ताः सुहृदः सदा प्रिय़हिते रतान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
भक्तान्पुजय़ता नित्यं द्विषतश्च निगृह्णता ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
भक्ताय़ नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
भक्तिं मय़ि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय़ः ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
भक्तिमानेष सततं मय़ि रामो दृढव्रतः ||
१४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
भक्तिमान्यः सदोत्थाय़ शुचिस्तद्गतमानसः |
१२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
भक्तिमेव पुरस्कृत्य मय़ा यज्ञपतिर्वसुः |
१५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
भक्तिर्भवतु मे नित्यं शाश्वती त्वय़ि शङ्कर ||
१८७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
भक्तिवादेन पार्थानामकस्मान्मधुसूदन |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
भक्तिश्चैषां प्रकर्तव्या व्यवहारे प्रदर्शिते ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु तु यः सदा |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
भक्तोऽनुरक्तः सततमुपवासकृशोऽवलः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
भक्तोऽस्मानौरसः पुत्रो भीम गृह्णातु मातरम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
भक्तोऽस्मान्भक्तिमांश्चाहं तमप्यरिनिषूदनम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
भक्तोऽय़ं परय़ा भक्त्या मामित्येव महाभुज |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिर्विशां पते ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
भक्त्या च भगवान्प्रीतः परय़ा पाकशासनः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
भक्त्या देवं विश्वोत्पन्नं; यस्मात्सर्वे लोकाः सूताः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
भक्त्या न चैवाध्यगच्छद्धनं सम्पूज्य देवताः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
भक्त्या परमय़ा राजन्वरं तेषां प्रदिष्टवान् |
१२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
भक्त्या प्रेम्णा च विप्रर्षे अस्मद्भक्त्या च ते श्रुतः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वामनुय़ास्यति ||
२९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
भक्त्या वृत्तिं समाख्यातुं भवतोऽन्तिकमागमम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
भक्त्या सम्पूजय़न्त्याद्यं गतिं चैषां ददाति सः ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
भक्षं मृगय़माणस्य सम्प्राप्तो द्विजसत्तम ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
भक्षं विचरमाणेन नचिराद्दृष्टमामिषम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
युधिष्ठिर उवाच
भक्षणे चैव ये दोषास्तांश्चैव पुरुषर्षभ ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
भक्षणे तु महान्दोषो वधेन सह कल्पते ||
१२ ख