chevron_left  भल्लेनापाहरद्द्रौणिःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
भल्लेनापाहरद्द्रौणिः स्मय़मान इवानघ ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
भल्लैः क्षुरैरर्धचन्द्रैर्वत्सदन्तैश्च पाण्डवः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
भल्लैर्भल्लाः समागम्य भीष्मपाण्डवय़ोर्युधि |
११ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
भल्लैर्भीमः प्रचिच्छेद भीमवेगतरैस्ततः ||
४३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
भल्लैश्चिच्छेद नवभिः पुत्रस्य तव पार्षतः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
भल्लैश्चिच्छेद वीभत्सुः शिरांस्यपि हय़ानपि ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
भल्लैश्छिन्नाः कराः पेतुः करिणां मदकर्षिणाम् |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
भल्लैस्त्रिभिर्युगपत्सञ्चकर्त; ननाद चोच्चैस्तरसाजिमध्ये ||
५६ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
भव एधस्व मोदस्व दानैस्तर्पय़ च द्विजान् ||
७० ग
आदि पर्व
अध्याय २२२
जरितो उवाच
भव त्वं दिवमास्थाय़ निरमित्रो हिरण्मय़ः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
भव नस्त्वं महाराज राजेह शरदां शतम् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
भव भस्मेति चोक्तः स न भस्म समपद्यत ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
भव मे सर्वनारीणामुत्तमा वरवर्णिनि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
भव राजा जय़ स्वर्गं सतो रक्षासतो जहि ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भय़म् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
भवं च धर्मं च षडाननं च; षड्व्रह्मपुत्रांश्च महानुभावान् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
भवगद्दर्शनाकाङ्क्षी प्राप्तोऽस्मीमं महागिरिम् |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
भवच्छन्दं समाज्ञाय़ नृत्येरन्नप्सरोगणाः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
भवतः प्रिय़मित्येवं महद्व्यसनमीदृशम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
भवतः शासनाद्दुःखमनुभूतं सहानुगैः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
भवतः शास्त्रमादाय़ तन्नस्तपति दुष्कृतम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
व्राह्मण उवाच
भवतः शीलमिच्छामि प्राप्तुमेष वरो मम ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
युधिष्ठिर उवाच
भवतः श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
भवतः सम्यगेषा हि वुद्धिर्हिंसाविवर्जिता |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
भवतः सानुवन्धस्य समुच्छेदं चिकीर्षवः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
भवतः स्म यथा तस्य पालय़ास्मान्यथा कविः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
भवतश्च प्रशंसाभिर्निन्दाभिरितरस्य च |
७२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
भवतश्च प्रिय़ं यत्स्यादस्माकं च यशस्करम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
भवतस्तु प्रमोहेन सर्वं संशय़ितं कृतम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
भवतस्तु प्रसादेन सङ्ग्रामे वहवो जिताः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
भवतस्ते सभाय़ां वै प्रेष्यतां पूर्वमागताः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
भवता कथितं ह्येतच्छ्रद्दधे चाहमच्युत |
३ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
भवता चानुगुप्तोऽसौ चरेत्तीर्थानि सर्वशः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
भवता चाभ्यनुज्ञातो जपेय़ं भूय़ एव हि ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
भवता चैव नाथेन पञ्च ग्रामा वृता मय़ा ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
भवता तत्कृतं कर्म येनावाप्तो जय़ो मय़ा |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
भवता तु वलं सर्वं धार्तराष्ट्रस्य वारितम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत् |
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
भवता निर्जितं वित्तं दातुमिच्छति कौरवः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
भवता पाल्यमानास्ते विवर्धन्ते पुनः पुनः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
भवता पुरुषव्याघ्र प्रत्यभिज्ञानकारणात् ||
६७ ग
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भवता मद्गृहे कञ्चित्कालं शुश्रूषमाणेन भवितव्यम् |
८० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
भवता यद्विधातव्यं तन्नः श्रेय़ः परन्तप ||
५२ ग
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
भवता रक्षणं कार्यं तत्तावत्कर्तुमर्हसि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
भवता वचनं व्रह्मंस्तस्मादेतद्वदाम्यहम् ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत् ||
१३ ख